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आदिवासी अंचलों के स्कूल खाली, शहरों में जमे शिक्षक!जनजातीय विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, वर्षों से खत्म नहीं हुई प्रतिनियुक्तियां…

आदिवासी अंचलों के स्कूल खाली, शहरों में जमे शिक्षक!
जनजातीय विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, वर्षों से खत्म नहीं हुई प्रतिनियुक्तियां

रिपोर्ट -रामकुमार राजपूत

छिंदवाड़ा (पंचायत दिशा समाचार)। जिले में जनजातीय कार्य विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि विभाग के दर्जनों शिक्षक और शिक्षिकाएं वर्षों से शिक्षा विभाग के शहरी स्कूलों में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ होकर आरामदायक नौकरी कर रहे हैं, जबकि आदिवासी एवं दूरस्थ क्षेत्रों के स्कूल आज भी शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार जनजातीय विभाग में पदस्थ कई शिक्षक लंबे समय से शिक्षा विभाग के शहरों एवं मुख्यालय के विद्यालयों में प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं। हैरानी की बात यह है कि विभाग द्वारा इनकी प्रतिनियुक्ति समाप्त करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा। इससे आदिवासी अंचलों के विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।


ग्रामीण क्षेत्रों के अभिभावकों का कहना है कि वनांचल एवं आदिवासी क्षेत्रों के कई स्कूलों में एक या दो शिक्षकों के भरोसे पूरी व्यवस्था चल रही है। कहीं अतिथि शिक्षकों के भरोसे स्कूल संचालित हो रहे हैं तो कहीं विद्यार्थियों को नियमित पढ़ाई तक नसीब नहीं हो पा रही। इसके बावजूद विभागीय अधिकारी शहरों में जमे शिक्षकों को वापस मूल पदस्थापना स्थल भेजने में रुचि नहीं दिखा रहे।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ शिक्षक वर्षों से राजनीतिक एवं विभागीय संरक्षण के चलते प्रतिनियुक्ति का लाभ उठा रहे हैं। यही कारण है कि आदेश होने के बावजूद कई मामलों में कार्रवाई नहीं होती। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी लगातार बनी हुई है, तो आखिर किस आधार पर इन प्रतिनियुक्तियों को जारी रखा गया है।
शिक्षा से जुड़े लोगों का कहना है कि शासन को ऐसे शिक्षकों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए जो वर्षों से प्रतिनियुक्ति का लाभ ले रहे हैं। साथ ही ऐसे कर्मचारियों को शासन की विशेष सुविधाओं एवं योजनाओं से भी वंचित करने की मांग उठने लगी है, ताकि वास्तव में आदिवासी क्षेत्रों में सेवा देने वाले कर्मचारियों को प्राथमिकता मिल सके।
अब देखना होगा कि जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त इस गंभीर मुद्दे पर क्या कदम उठाते हैं या फिर आदिवासी क्षेत्रों के बच्चे इसी तरह शिक्षकों की कमी का दंश झेलते रहेंगे।