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आदिवासी अंचल के स्कूल शिक्षक विहीन, जिला मुख्यालय में अतिशेष शिक्षकों की भरमार….!

आदिवासी अंचल के स्कूल शिक्षक विहीन, जिला मुख्यालय में अतिशेष शिक्षकों की भरमार
सहायक आयुक्त की कार्यप्रणाली पर सवाल, हरई-तामिया के बच्चों की पढ़ाई भगवान भरोसे
छिंदवाड़ा। जनजातीय कार्य विभाग में पदस्थापना व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक ओर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों हरई, तामिया और दूरस्थ ग्रामीण अंचलों के कई स्कूल आज भी शिक्षकों के अभाव से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिला मुख्यालय एवं विभिन्न संस्थानों में बड़ी संख्या में अतिशेष शिक्षक-शिक्षिकाएं पदस्थ होकर सुविधाजनक स्थानों पर सेवाएं दे रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, कन्या शिक्षा परिसर छिंदवाड़ा, कन्या शिक्षा परिसर परासिया, कन्या शिक्षा परिसर बिछुआ तथा नवीन बालक आश्रम छिंदवाड़ा सहित अन्य संस्थानों में आवश्यकता से अधिक शिक्षकों की पदस्थापना होने के आरोप हैं। जबकि हरई और तामिया विकासखंड के कई विद्यालयों में या तो शिक्षकों की संख्या अत्यंत कम है या फिर कुछ स्कूल ऐसे भी बताए जा रहे हैं जहां एक भी नियमित शिक्षक पदस्थ नहीं है।
शिक्षा के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करने वाला विभाग आखिर इन शिक्षक विहीन स्कूलों की ओर कब ध्यान देगा, यह बड़ा सवाल बन गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जिले में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हैं तो फिर दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षा से वंचित क्यों रखा जा रहा है?
सबसे बड़ा सवाल जनजातीय कार्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों, विशेषकर सहायक आयुक्त की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहा है। आरोप है कि वर्षों से जिला मुख्यालय और सुविधाजनक संस्थानों में जमे अतिशेष शिक्षकों को हटाने तथा आवश्यकता वाले विद्यालयों में पदस्थ करने की दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
वहीं आदिवासी हितों की आवाज उठाने वाले जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि हरई और तामिया जैसे आदिवासी अंचलों में शिक्षकों की भारी कमी किसी से छिपी नहीं है, इसके बावजूद इस मुद्दे को लेकर अपेक्षित दबाव या पहल दिखाई नहीं दे रही है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वास्तव में जिले में अतिशेष शिक्षक उपलब्ध हैं तो तत्काल युक्तियुक्तकरण कर उन्हें उन विद्यालयों में भेजा जाना चाहिए जहां बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। अन्यथा “सबको शिक्षा” और “आदिवासी विकास” जैसे दावे केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगे।
बड़ा सवाल यह है कि आखिर आदिवासी बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कब तक चलता रहेगा? क्या जिला मुख्यालय में जमे अतिशेष शिक्षकों को हटाकर शिक्षक विहीन स्कूलों तक पहुंचाया जाएगा, या फिर दूरस्थ गांवों के बच्चे यूं ही शिक्षा के अधिकार से वंचित रहेंगे?
नोट: समाचार में उल्लिखित आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। संबंधित विभाग एवं अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।