नारों और कागजों में सिमटकर रह गई शिक्षा व्यवस्था : नकुलनाथ
12 वर्षों में कुल बजट में शिक्षा मंत्रालय का हिस्सा 4.6 प्रतिशत से घटकर 2.5 प्रतिशत रहने का दावा
छिंदवाड़ा। जिले के पूर्व सांसद नकुलनाथ ने देश और प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि शिक्षा व्यवस्था आज नारों और कागजों तक सीमित होकर रह गई है। जमीनी स्तर पर जर्जर स्कूल भवन, मूलभूत सुविधाओं की कमी, शिक्षकों के हजारों रिक्त पद और शिक्षा बजट में कमी जैसी समस्याओं ने व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
नकुलनाथ ने कहा कि सरकार द्वारा चलाए गए “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान के परिणामों पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उनका कहना है कि यदि इस अभियान को पूरी निष्ठा और प्रभावी तरीके से जमीन पर लागू किया गया होता तो बालिकाओं की शिक्षा की स्थिति बेहतर होती।
उन्होंने शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि अभियान की शुरुआत के दस वर्ष बाद भी केवल लगभग 55 प्रतिशत बालिकाएं ही 9वीं से 12वीं कक्षा तक पहुंच पा रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर शेष बालिकाएं माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा से क्यों दूर हो रही हैं।
पांच वर्षों में 17 हजार से अधिक सरकारी स्कूल बंद होने का दावा
पूर्व सांसद नकुलनाथ ने कहा कि शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच वर्षों में देशभर में 17,141 शासकीय स्कूल बंद हुए हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और इसमें मध्यप्रदेश भी शामिल है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में ऐसी स्थिति बन गई है कि कहीं बच्चे हैं तो शिक्षक नहीं हैं, कहीं शिक्षक और बच्चे दोनों हैं तो स्कूल भवन जर्जर हैं और मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। इससे सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की शिक्षा सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है।
शिक्षा बजट में कमी पर उठाए सवाल
नकुलनाथ ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में कुल बजट में शिक्षा मंत्रालय का हिस्सा 4.6 प्रतिशत से घटकर 2.5 प्रतिशत रह गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र और राज्य सरकारों ने शिक्षा के बजट को बढ़ाने के बजाय उसमें कमी की है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा किसी भी देश और प्रदेश के भविष्य की नींव होती है। ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त निवेश और संसाधन उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
मध्यप्रदेश में हजारों शिक्षकों के पद खाली
नकुलनाथ ने मध्यप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि प्रदेश के स्कूलों में शिक्षकों के 52,019 पद रिक्त बताए जा रहे हैं, जिनमें से 47,122 पद प्रारंभिक स्तर के हैं।
उन्होंने कहा कि कुल रिक्त पदों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा प्राथमिक शिक्षा से जुड़ा हुआ है। ऐसे में सबसे बड़ी चिंता शिक्षा की बुनियाद को लेकर है। यदि प्राथमिक स्तर पर बच्चों को पर्याप्त शिक्षक और बेहतर सुविधाएं नहीं मिलेंगी तो आगे की शिक्षा पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
कक्षा 9वीं तक पहुंचते-पहुंचते गणित में कमजोर हो रहे बच्चे
नकुलनाथ ने नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि मध्यप्रदेश में कक्षा 9वीं तक पहुंचने वाले बच्चों में केवल 36 प्रतिशत बच्चे ही गणित के सवाल हल कर पाते हैं।
उन्होंने इसके पीछे शिक्षकों की कमी और शिक्षकों पर शैक्षणिक कार्यों के अलावा अन्य जिम्मेदारियां थोपे जाने को प्रमुख कारण बताया। उनका कहना है कि शिक्षक अपने मूल शिक्षण कार्य के बजाय कई बार दूसरे प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं, जिसका असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ता है।
पूर्व सांसद ने सरकार से शिक्षा व्यवस्था को प्राथमिकता देने, शिक्षकों के रिक्त पदों को जल्द भरने, जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत कराने और शिक्षा बजट में वृद्धि करने की मांग की है।








