वीरांगना रानी दुर्गावती कन्या छात्रावास अमरवाड़ा की अधीक्षिका निलंबित, लेकिन कार्रवाई के बाद भी व्यवस्था पर उठे सवाल
छात्राओं की शिकायत के बाद हुई कार्रवाई, जनजातीय कार्य विभाग में निलंबन और कोर्ट से स्टे का कथित खेल चर्चा में
छिंदवाड़ा/अमरवाड़ा। वीरांगना रानी दुर्गावती कन्या छात्रावास अमरवाड़ा की अधीक्षिका को निलंबित किए जाने की कार्रवाई के बाद जनजातीय कार्य विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। बताया जा रहा है कि छात्राओं ने एक दिन पूर्व कलेक्ट्रेट पहुंचकर छात्रावास की समस्याओं और व्यवस्थाओं को लेकर शिकायत की थी, जिसके बाद विभाग द्वारा कार्रवाई की गई।
हालांकि, जनजातीय कार्य विभाग में केवल निलंबन की कार्रवाई से व्यवस्था सुधरेगी या नहीं, इसे लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विभाग से जुड़े लोगों का कहना है कि कई मामलों में अधीक्षक और अधीक्षिकाओं के खिलाफ कार्रवाई होने के बाद वे न्यायालय से स्थगन आदेश लेकर वापस अपनी स्थिति मजबूत कर लेते हैं।

“निलंबित करो, कोर्ट से स्टे ले आएंगे” जैसी मानसिकता पर सवाल
विभागीय कार्रवाई को लेकर यह चर्चा भी सामने आ रही है कि कुछ कर्मचारी निलंबन को लेकर गंभीर नहीं हैं और कथित तौर पर यह सोच रखते हैं कि कार्रवाई के बाद न्यायालय से स्टे प्राप्त कर लिया जाएगा। यदि विभागीय कार्रवाई के बाद बार-बार न्यायालय से स्थगन आदेश मिलने की स्थिति बन रही है, तो विभाग को भी अपनी जांच, दस्तावेजों और कार्रवाई की कानूनी मजबूती पर विचार करने की जरूरत है।
जनजातीय कार्य विभाग के अधिकारियों द्वारा अधीक्षक अथवा अधीक्षिका को निलंबित तो किया जाता है, लेकिन आरोप है कि कई मामलों में आगे की विभागीय कार्रवाई प्रभावी ढंग से नहीं हो पाती। इससे कार्रवाई का उद्देश्य अधूरा रह जाता है और छात्रावासों में रहने वाले आदिवासी समाज के बच्चों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
छिंदवाड़ा जनजातीय विभाग में “कोर्ट से स्टे” की चर्चा
जनजातीय कार्य विभाग छिंदवाड़ा में इन दिनों निलंबन के बाद न्यायालय से स्टे लेने की चर्चाएं आम होती जा रही हैं। सवाल यह है कि यदि किसी कर्मचारी के विरुद्ध गंभीर शिकायतों के आधार पर कार्रवाई की जाती है, तो विभाग अपनी कार्रवाई को कानूनी रूप से इतना मजबूत क्यों नहीं बना पाता कि जांच और अनुशासनात्मक प्रक्रिया प्रभावी तरीके से आगे बढ़ सके?
अटैचमेंट पर पदस्थ शिक्षक की भूमिका पर भी सवाल
सूत्रों के अनुसार, जनजातीय कार्य विभाग में अटैचमेंट पर पदस्थ एक शिक्षक द्वारा विभागीय कार्यालय में बाबू का कार्य किए जाने की चर्चा है। आरोप है कि उक्त व्यक्ति कुछ शिक्षक, अधीक्षक और अधीक्षिकाओं को कार्रवाई होने की स्थिति में न्यायालय से स्टे लेने संबंधी सलाह भी देता है।
हालांकि, इस संबंध में विभागीय अधिकारियों का पक्ष सामने आना आवश्यक है। यदि कोई शिक्षक अपने मूल शैक्षणिक कार्य से हटकर लंबे समय से कार्यालयीन कार्य कर रहा है, तो उसके अटैचमेंट और जिम्मेदारियों की भी जांच की जानी चाहिए।
आखिर कब सुधरेगी आदिवासी बच्चों की व्यवस्था?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जनजातीय कार्य विभाग के छात्रावासों में रहने वाले आदिवासी समाज के बच्चों को आखिर कब बेहतर और सुरक्षित व्यवस्थाएं मिलेंगी? शिकायतें होती हैं, कार्रवाई होती है, निलंबन होते हैं और फिर कानूनी प्रक्रिया शुरू हो जाती है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच छात्र-छात्राओं की समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं।
वीरांगना रानी दुर्गावती कन्या छात्रावास अमरवाड़ा की अधीक्षिका के निलंबन के बाद अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विभाग आगे क्या ठोस कार्रवाई करता है और छात्राओं की शिकायतों का स्थायी समाधान कब तक किया जाता है।
अब सवाल सिर्फ निलंबन का नहीं, बल्कि व्यवस्था को वास्तव में सुधारने का है।








