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बिछुआ ब्लॉक के स्कूलों में कब जलेगी शिक्षा की लौ?छिंदवाड़ा जनजातीय विभाग में अटैचमेंट का खेल!

बिछुआ ब्लॉक के स्कूलों में कब जलेगी शिक्षा की लौ?
छिंदवाड़ा जनजातीय विभाग में अटैचमेंट का खेल!
अंग्रेजी के शिक्षक को छात्रावास अधीक्षक बनाने से स्कूल की पढ़ाई प्रभावित होने के आरोप, शासन के निर्देशों पर उठे सवाल

छिंदवाड़ा/बिछुआ। एक ओर मध्यप्रदेश सरकार सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और अनावश्यक अटैचमेंट समाप्त करने की दिशा में कदम उठाने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर छिंदवाड़ा जिले के जनजातीय कार्य विभाग में शिक्षकों को छात्रावासों में वैकल्पिक व्यवस्था के नाम पर अटैच किए जाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बिछुआ विकासखंड के पुलपुलडोह माध्यमिक विद्यालय का मामला सामने आया है, जहां अंग्रेजी विषय के शिक्षक को छात्रावास अधीक्षक की जिम्मेदारी दिए जाने के बाद विद्यालय में अंग्रेजी की पढ़ाई प्रभावित होने की बात कही जा रही है। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि जब किसी विद्यालय में किसी विषय का शिक्षक सीमित संख्या में उपलब्ध हो, तो उसे अन्य जिम्मेदारी देने की स्थिति में विद्यार्थियों की नियमित पढ़ाई का क्या होगा?
मामले को लेकर जनजातीय कार्य विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
पुलपुलडोह स्कूल में थे अंग्रेजी के एकमात्र शिक्षक?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिछुआ ब्लॉक के पुलपुलडोह माध्यमिक विद्यालय में अंग्रेजी विषय पढ़ाने के लिए संबंधित शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका थी। आरोप है कि वर्ष 2021 में उन्हें स्कूल के शैक्षणिक कार्य से अलग कर छात्रावास संचालन की जिम्मेदारी दे दी गई।
इसके बाद विद्यालय में अंग्रेजी विषय के लिए वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था नहीं किए जाने की बात भी सामने आई है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी स्कूल में विषय विशेषज्ञ शिक्षक उपलब्ध नहीं है, तो उस विषय की पढ़ाई विद्यार्थियों को किस प्रकार और कितनी नियमितता से मिल रही है?
शिक्षा विभाग और जनजातीय कार्य विभाग को इस संबंध में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि पुलपुलडोह माध्यमिक विद्यालय में वर्तमान में अंग्रेजी विषय की पढ़ाई कौन करा रहा है और इसके लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था की गई है।
शासन के निर्देशों की अनदेखी का आरोप
मामले में यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि शासन के निर्देशों के अनुसार शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में अटैचमेंट देने से बचने तथा विद्यालयों की पढ़ाई प्रभावित न होने देने की व्यवस्था की गई है।
जनजातीय कार्य विभाग द्वारा संचालित छात्रावासों में अधीक्षक का प्रभार देते समय भी ऐसी व्यवस्था किए जाने का उद्देश्य बताया जाता है, जिससे संबंधित शिक्षक अपने मूल विद्यालय के शैक्षणिक कार्य से पूरी तरह अलग न हों।
बताया जाता है कि छात्रावास के निकट पदस्थ शिक्षक को जिम्मेदारी दिए जाने से वह विद्यालय में शिक्षण कार्य और छात्रावास संचालन—दोनों जिम्मेदारियां बेहतर तरीके से निभा सकता है।
लेकिन बिछुआ सहित जिले के अन्य क्षेत्रों में शिक्षकों को छात्रावासों में अटैच किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या सभी मामलों में संबंधित शिक्षकों की विद्यालयों में नियमित उपस्थिति और विद्यार्थियों की पढ़ाई सुनिश्चित की जा रही है?
दो पीरियड पढ़ाने” की व्यवस्था पर भी सवाल
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि छात्रावास अधीक्षक की जिम्मेदारी संभाल रहे शिक्षकों के लिए विद्यालय में शैक्षणिक कार्य जारी रखना जरूरी है, ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।
लेकिन यदि शिक्षक का मूल विद्यालय और छात्रावास एक-दूसरे से अधिक दूरी पर हैं, तो दोनों जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन कैसे होगा?
यही सवाल अब जनजातीय कार्य विभाग की व्यवस्था पर उठ रहे हैं।
क्या छात्रावास अधीक्षक बनाए गए शिक्षक नियमित रूप से अपने मूल विद्यालय में पहुंच रहे हैं? क्या वे विद्यार्थियों को निर्धारित समय तक पढ़ा रहे हैं? और यदि नहीं, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी?
बच्चों की पढ़ाई सबसे बड़ा सवाल
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा किसी अधिकारी या शिक्षक का नहीं, बल्कि आदिवासी अंचल के बच्चों की शिक्षा का है।
दूरस्थ क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में पहले से ही विषयवार शिक्षकों की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। ऐसे में उपलब्ध शिक्षकों को भी अन्य जिम्मेदारियों में लगाने से शिक्षा व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
पुलपुलडोह जैसे स्कूलों में यदि अंग्रेजी जैसे महत्वपूर्ण विषय के लिए नियमित शिक्षक उपलब्ध नहीं है, तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों की शैक्षणिक तैयारी पर पड़ सकता है।
विकासखंड शिक्षा अधिकारी द्वारा एनओसी दिए जाने पर भी उठे सवाल
मामले में यह जानकारी भी सामने आई है कि संबंधित शिक्षक को छात्रावास की जिम्मेदारी देने के लिए विकासखंड शिक्षा अधिकारी स्तर से एनओसी जारी की गई।
अब सवाल यह है कि एनओसी जारी करने से पहले विद्यालय में शिक्षक की उपलब्धता, विषयवार पढ़ाई और विद्यार्थियों के हितों का परीक्षण किया गया था या नहीं?
यदि विद्यालय में संबंधित विषय का शिक्षक सीमित संख्या में था, तो उसके स्थान पर वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था क्यों नहीं की गई—यह भी जांच का विषय है।
सहायक आयुक्त बोले—अधीक्षकों की कमी के कारण वैकल्पिक व्यवस्था
मामले में जनजातीय कार्य विभाग, छिंदवाड़ा के सहायक आयुक्त सत्येंद्र सिंह मरकाम ने विभाग का पक्ष रखते हुए कहा—
“छात्रावासों में अधीक्षक/अधीक्षिका की कमी के कारण शिक्षकों को अटैच किया जा रहा है। यह वैकल्पिक व्यवस्था है। बिछुआ क्षेत्र में छात्रावास के संचालन के लिए शिक्षक को अटैच किया गया है। जब तक शासन से अन्य निर्देश नहीं मिलते, तब तक शिक्षकों को अधीक्षक की जिम्मेदारी दी जा रही है।”
बड़ा सवाल—छात्रावास भी चले और स्कूल भी, लेकिन बच्चों की पढ़ाई कौन बचाएगा?
जनजातीय कार्य विभाग के सामने छात्रावासों में अधीक्षकों की कमी निश्चित रूप से एक प्रशासनिक चुनौती हो सकती है। लेकिन इसका समाधान ऐसा होना चाहिए, जिससे छात्रावास संचालन के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित न हो।
बिछुआ ब्लॉक के पुलपुलडोह माध्यमिक विद्यालय का मामला अब विभागीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
जरूरत है कि जिला प्रशासन और जनजातीय कार्य विभाग पूरे मामले की समीक्षा करे और स्पष्ट करे—
पुलपुलडोह माध्यमिक विद्यालय में वर्तमान में अंग्रेजी विषय कौन पढ़ा रहा है?
शिक्षक को छात्रावास की जिम्मेदारी दिए जाने के बाद वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
क्या संबंधित शिक्षक अपने मूल विद्यालय में नियमित शैक्षणिक कार्य कर रहे हैं?
क्या छात्रावास अधीक्षक बनाए गए सभी शिक्षकों के मूल स्कूलों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है?
जिले में कितने शिक्षकों को छात्रावासों में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत लगाया गया है?
क्योंकि सवाल केवल अटैचमेंट का नहीं हैसवाल उन बच्चों के भविष्य का है, जिनके लिए सरकार स्कूल और छात्रावास दोनों चला रही है।
अब देखना होगा कि छिंदवाड़ा जनजातीय कार्य विभाग इस व्यवस्था की समीक्षा करता है या फिर बिछुआ ब्लॉक के स्कूलों में शिक्षा की लौ यूं ही कमजोर पड़ती रहेगी।