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बिना वैध गैस कनेक्शन के 10 साल चला छात्रावास, फिर गैस रिफिलिंग के नाम पर किस बात का भुगतान?

बिना वैध गैस कनेक्शन के 10 साल चला छात्रावास, फिर गैस रिफिलिंग के नाम पर किस बात का भुगतान?
भिमालगोंदी आदिवासी सीनियर बालक छात्रावास का मामला: नोटिस के बाद कार्रवाई क्यों ठंडी पड़ी? सहायक आयुक्त कार्यालय की भूमिका पर उठे सवाल
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छिंदवाड़ा। जनजातीय कार्य विभाग के आदिवासी सीनियर बालक छात्रावास भिमालगोंदी में गैस खरीदी एवं गैस रिफिलिंग के नाम पर वर्षों से हुए खर्च को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उपलब्ध जानकारी और लगाए जा रहे आरोपों के अनुसार छात्रावास लंबे समय तक वैध गैस कनेक्शन के बिना संचालित होता रहा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर गैस रिफिलिंग और गैस खरीदी के नाम पर सरकारी राशि का भुगतान किस आधार पर किया गया?
मामला केवल एक छात्रावास की अव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी धन के उपयोग, बिलों के सत्यापन और विभागीय निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
वैध कनेक्शन नहीं था तो रिफिलिंग किसकी हुई?
यदि विभागीय रिकॉर्ड और जांच में यह तथ्य सही पाया जाता है कि छात्रावास में वैध गैस कनेक्शन उपलब्ध नहीं था, तो पिछले वर्षों में गैस रिफिलिंग के नाम पर लगाए गए बिलों की जांच जरूरी हो जाती है।
सवाल यह है कि—
● बिना वैध कनेक्शन के गैस सिलेंडर किस आधार पर प्राप्त किए गए?
● रिफिलिंग के बिल किस उपभोक्ता नंबर अथवा कनेक्शन के आधार पर बनाए गए?
● इन बिलों का सत्यापन किस अधिकारी या कर्मचारी ने किया?
● भुगतान से पहले दस्तावेजों की जांच क्यों नहीं हुई?
● पिछले लगभग 10 वर्षों में गैस खरीदी और रिफिलिंग के नाम पर कुल कितनी सरकारी राशि खर्च हुई?
इन सवालों का जवाब केवल विभागीय बयान से नहीं, बल्कि बिल, वाउचर, कैशबुक, स्टॉक रजिस्टर और भुगतान रिकॉर्ड सार्वजनिक करके दिया जाना चाहिए।
पूर्व अधीक्षक को नोटिस, लेकिन आगे क्या हुआ?
मामले में छात्रावास के पूर्व अधीक्षक शांताराम ठाकरे को नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नोटिस जारी होने के बाद विभाग ने क्या कार्रवाई की?
क्या नोटिस का जवाब प्राप्त हुआ?
क्या विभागीय जांच पूरी हुई?
क्या रिकॉर्ड और बिलों का सत्यापन कराया गया?
क्या किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता पाई गई?
यदि अनियमितता पाई गई तो जिम्मेदारी तय कर वसूली अथवा अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
नोटिस जारी करना कार्रवाई की शुरुआत हो सकती है, लेकिन नोटिस के बाद फाइलों में सन्नाटा क्यों छा गया, इसका जवाब जनजातीय कार्य विभाग को देना होगा।
सहायक आयुक्त कार्यालय पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
मामले की गंभीरता को देखते हुए सहायक आयुक्त सत्येंद्र मरकाम के कार्यालय की निगरानी और कार्रवाई की प्रक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं। सवाल किसी व्यक्ति को बिना जांच दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि यह जानने का है कि इतने गंभीर आरोपों और नोटिस के बाद भी मामले में अंतिम कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की गई।
यदि आरोप निराधार हैं तो विभाग को दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
और यदि रिकॉर्ड में कोई अनियमितता है तो फिर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई में देरी क्यों?
बाबू-अधीक्षक की मिलीभगत या निगरानी की बड़ी चूक?
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि विभागीय कार्यालय और छात्रावास प्रबंधन के बीच मिलीभगत अथवा गंभीर निगरानी की कमी के कारण वर्षों तक गैस से संबंधित खर्चों की प्रभावी जांच नहीं हुई।
हालांकि, मिलीभगत अथवा वित्तीय अनियमितता की पुष्टि निष्पक्ष जांच के बाद ही हो सकती है, लेकिन उपलब्ध परिस्थितियां निश्चित रूप से विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती हैं।
आखिर एक छात्रावास में वर्षों तक गैस कनेक्शन की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं हुई?
आदिवासी बच्चों की सुविधाओं के नाम पर खर्च का हिसाब कौन देगा?
सरकार आदिवासी विद्यार्थियों के लिए छात्रावासों पर करोड़ों रुपये खर्च करती है, ताकि बच्चों को भोजन और अन्य मूलभूत सुविधाएं मिल सकें। ऐसे में यदि गैस खरीदी और रिफिलिंग से जुड़े खर्चों पर सवाल उठ रहे हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होना जनहित में आवश्यक है।
अब मांग उठ रही है कि पिछले 10 वर्षों के गैस खरीदी और रिफिलिंग से संबंधित सभी दस्तावेजों की विशेष जांच कराई जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि—
सरकारी राशि कितनी खर्च हुई?
किसके आदेश पर भुगतान हुआ?
बिलों का सत्यापन किसने किया?
और छात्रावास में वैध गैस कनेक्शन आखिर कब और किसके द्वारा लिया गया?
अब विभाग के सामने सीधा सवाल—जांच होगी या मामला फिर फाइलों में दब जाएगा?
भिमालगोंदी छात्रावास का यह मामला जनजातीय कार्य विभाग की जवाबदेही की परीक्षा बन गया है।
नोटिस देने के बाद कार्रवाई क्यों नहीं दिख रही?
बिना वैध गैस कनेक्शन के खर्च का हिसाब कौन देगा?
क्या पिछले 10 वर्षों के रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच होगी?
और यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है तो क्या जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होगी?
जनजातीय कार्य विभाग को अब इन सवालों से बचने के बजाय दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक जवाब देना चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ गैस सिलेंडर का नहीं है… सवाल आदिवासी बच्चों के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी राशि की जवाबदेही का है।