Home DHARMA 9 साल की उम्र में छोड़ दी सांसारिक दुनिया, आगे चलकर बने...

9 साल की उम्र में छोड़ दी सांसारिक दुनिया, आगे चलकर बने शंकराचार्य… जन्मभूमि को दिया एशिया का सबसे बड़ा स्फटिक शिवलिंग..

9 साल की उम्र में छोड़ दी सांसारिक दुनिया, आगे चलकर बने शंकराचार्य… जन्मभूमि को दिया एशिया का सबसे बड़ा स्फटिक शिवलिंग
नेपाल से आया था स्फटिक पत्थर, इंदौर के कारीगरों ने तराशकर बनाया दिव्य शिवलिंग; 2002 में दिधोरी में हुई प्राण-प्रतिष्ठा..
विशेष स्टोरी | रामकुमार राजपूत

छिंदवाड़ा(सिवनी)। 2 सितंबर 1924 धनपति उपाध्याय और गिरिजा देवी के घर एक बालक ने जन्म लिया। माता-पिता ने उसका नाम रखा पोथीराम उपाध्याय। किसी को उस वक्त अंदाजा नहीं था कि यही बालक आगे चलकर आध्यात्म और सनातन परंपरा की दुनिया में एक बड़ा नाम बनेगा।
महज 9 वर्ष की उम्र में पोथीराम का मन अध्यात्म और धर्म की ओर ऐसा मुड़ा कि उन्होंने सांसारिक जीवन से दूरी बना ली। समय के साथ यही बालक संन्यास की राह पर आगे बढ़ा और बाद में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के रूप में देशभर में प्रतिष्ठित हुए।


लेकिन उनकी जन्मभूमि से जुड़ी एक ऐसी धार्मिक धरोहर भी है, जो आज श्रद्धालुओं के आकर्षण का बड़ा केंद्र बनी हुई है। सिवनी जिले के दिधोरी गांव स्थित पितृधाम में गुरु रत्नेश्वर महादेव मंदिर में विराजित है विशाल स्फटिक शिवलिंग। दावा है कि यह एशिया का सबसे बड़ा स्फटिक शिवलिंग है।


नेपाल से आया था बेशकीमती स्फटिक
मंदिर के पुजारी आचार्य दिलीप तिवारी के अनुसार, इस विशाल स्फटिक शिवलिंग के लिए पत्थर नेपाल से प्राप्त हुआ था। बताया जाता है कि नेपाल के राजा ने यह स्फटिक पत्थर उदासीन अखाड़ा के महंत श्यामदास जी महाराज को प्रदान किया था।
बाद में महंत श्यामदास जी महाराज ने इस स्फटिक को जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज को दान में दिया। इसके बाद इंदौर के कुशल कारीगरों ने इस विशाल स्फटिक पत्थर को तराशकर शिवलिंग का स्वरूप प्रदान किया।


65 किलो वजनी है स्फटिक शिवलिंग
दिधोरी के गुरु रत्नेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित इस स्फटिक शिवलिंग का वजन करीब 65 किलोग्राम बताया जाता है। मंदिर के पुजारी के मुताबिक इसकी विशेषता सिर्फ इसका आकार और वजन नहीं, बल्कि इसके पीछे जुड़ी धार्मिक आस्था और इतिहास भी है।
मान्यता के अनुसार स्फटिक प्राकृतिक रूप से लंबे समय में तैयार होने वाला अत्यंत कठोर और पारदर्शी पदार्थ है। इसी वजह से सनातन परंपरा में स्फटिक को विशेष पवित्रता और आध्यात्मिक महत्व से जोड़ा जाता है।


जन्मभूमि में बनवाया पितृधाम
संन्यास ग्रहण करने के बाद पोथीराम उपाध्याय जब जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती बने, तब उन्होंने अपनी जन्मभूमि दिधोरी को भी एक धार्मिक पहचान देने का संकल्प लिया।
इसी भावना से यहां पितृधाम का निर्माण कराया गया और उसमें गुरु रत्नेश्वर महादेव की स्थापना की गई।
स्फटिक को रत्न के समान पवित्र और मूल्यवान माना जाता है, इसी कारण भगवान शिव के इस स्वरूप को रत्नेश्वर महादेव नाम दिया गया।
एक बालक से जगद्गुरु तक का सफर
पोथीराम उपाध्याय का जीवन अपने आप में एक ऐसी कहानी है, जिसमें बचपन से ही अध्यात्म की ओर झुकाव, संन्यास और फिर शंकराचार्य के पद तक पहुंचने की यात्रा दिखाई देती है।
आज दिधोरी में स्थापित गुरु रत्नेश्वर महादेव मंदिर केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि उस बालक की जन्मभूमि से जुड़ी आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक भी माना जाता है।
एक ओर जन्मभूमि की मिट्टी से जुड़ी स्मृतियां… दूसरी ओर नेपाल से आए स्फटिक पत्थर से निर्मित विशाल शिवलिंग—दिधोरी की यह धार्मिक धरोहर श्रद्धा, इतिहास और आध्यात्म का अनोखा संगम बन गई है।
खास बात
2002 में दिधोरी में गुरु रत्नेश्वर महादेव की स्थापना कराई गई। मंदिर में विराजित स्फटिक शिवलिंग का वजन करीब 65 किलोग्राम बताया जाता है।