कागज़ों में स्कूल, हकीकत में दफ्तर!
भोपाल के आदेशों के बाद भी जनजातीय विभाग में शिक्षकों की अटैचमेंट पर उठे सवाल, ग्रामीण स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित होने के आरोप
छिंदवाड़ा। मध्यप्रदेश शासन द्वारा आदिवासी अंचलों के शासकीय विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और कार्यालयों में शिक्षकों की अटैचमेंट समाप्त करने के निर्देश जारी किए जा चुके हैं। शासन का उद्देश्य स्पष्ट था कि शिक्षक अपने मूल विद्यालय में सेवाएं दें, ताकि ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो। हालांकि, छिंदवाड़ा जिले में इन निर्देशों के पालन को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं।
स्थानीय स्तर पर मिल रही शिकायतों और विभागीय सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त कार्यालय में अब भी कुछ शिक्षक विभिन्न प्रशासनिक कार्यों में संलग्न हैं। आरोप है कि इससे कई ग्रामीण विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता प्रभावित हो रही है और विद्यार्थियों की नियमित पढ़ाई पर असर पड़ रहा है।
इन्हीं आरोपों के बीच शिक्षक सुभाष देशपांडे का नाम भी चर्चा में है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उनकी पदस्थापना समय-समय पर विभिन्न विद्यालयों में दर्शाई गई, जबकि वे लंबे समय से सहायक आयुक्त कार्यालय से जुड़े प्रशासनिक कार्य देख रहे हैं। विभागीय सूत्रों का यह भी कहना है कि वे स्थानांतरण, अनुकंपा नियुक्ति, पेंशन, न्यायालयीन प्रकरण एवं अन्य प्रशासनिक मामलों में सहयोग करते रहे हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और विभाग की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।
इस बीच जिले के कई आदिवासी एवं ग्रामीण विद्यालयों में शिक्षकों की कमी की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। अभिभावकों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि शासन के निर्देशों के अनुरूप सभी शिक्षक अपने मूल विद्यालयों में सेवाएं दें, तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार संभव है और विद्यार्थियों को नियमित शिक्षण का लाभ मिलेगा।
उठ रहे हैं कई अहम सवाल
क्या शासन द्वारा जारी अटैचमेंट समाप्त करने के निर्देशों का जिले में पूर्ण पालन हुआ?
वर्तमान में कितने शिक्षक कार्यालयों में संलग्न हैं और किस आदेश के आधार पर?
यदि किसी शिक्षक को प्रशासनिक कार्य सौंपे गए हैं, तो उसकी वैधानिक अनुमति किस स्तर से प्राप्त है?
जिन विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है, वहां रिक्त पदों की पूर्ति के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
इन प्रश्नों के उत्तर सामने आना आवश्यक माने जा रहे हैं ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके और यदि कहीं नियमों का पालन नहीं हुआ है तो उसकी समीक्षा की जा सके।
नोट: यह समाचार स्थानीय शिकायतों, विभागीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी एवं उपलब्ध तथ्यों के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। संबंधित अधिकारी एवं जनजातीय कार्य विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समान प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया जाएगा।








