बालक छात्रावासों में महिला अधीक्षक नियुक्ति पर बवाल
क्या जनजाति कार्य विभाग खुद तोड़ रहा अपने ही सुरक्षा नियम?
रात्रि निवास अनिवार्य, फिर भी विवादित पदस्थापनाओं पर उठे सवाल..
छिंदवाड़ा (पंचायत दिशा) जिले का जनजाति कार्य विभाग एक बार फिर अपनी कार्यप्रणाली को लेकर कठघरे में नजर आ रहा है। इस बार मामला बालक छात्रावासों में महिला शिक्षिकाओं की नियुक्ति का है, जिसने विभागीय नियमों, सुरक्षा व्यवस्थाओं और प्रशासनिक जिम्मेदारी पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार जिले के आदिवासी बालक आश्रम बड़कूही, आदिवासी सीनियर बालक छात्रावास पगारा, आदिवासी बालक छात्रावास रायबासा पांढुरना , आदिवासी बालक आश्रम गयाखुरी पांढुरना , ऐसे कई बालक छात्रावासों में महिला शिक्षिकाओं को अधीक्षक अथवा प्रभारी के रूप में पदस्थ किया गया है। जबकि छात्रावास संचालन से जुड़े नियमों और व्यवहारिक व्यवस्था के अनुसार अधीक्षक को छात्रावास परिसर में रात्रि निवास करना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या विभाग ने इन नियुक्तियों से पहले सुरक्षा, गोपनीयता और प्रशासनिक संवेदनशीलता जैसे पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कन्या छात्रावासों में सुरक्षा कारणों से पुरुष कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर सख्त नियम और संवेदनशीलता अपनाई जाती है, तो फिर बालक छात्रावासों में महिला कर्मचारियों की पदस्थापना किस नीति के तहत की जा रही है?
सूत्रों के अनुसार कई छात्रावासों में रात्रि के समय पुरुष कर्मचारी, चौकीदार और अन्य स्टाफ भी मौजूद रहते हैं। ऐसे में यदि भविष्य में कोई विवाद, सुरक्षा संबंधी समस्या या अप्रिय स्थिति उत्पन्न होती है, तो उसकी जवाबदेही आखिर किसकी होगी? क्या विभागीय अधिकारी इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं?
विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि लंबे समय से जनजाति कार्य विभाग में पदस्थापनाओं और अटैचमेंट को लेकर पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते रहे हैं। अब बालक छात्रावासों में की जा रही इन नियुक्तियों ने नई बहस छेड़ दी है।
हालांकि विभाग की ओर से अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इन नियुक्तियों के लिए कौन-से दिशा-निर्देश अपनाए गए और क्या शासन स्तर से कोई विशेष अनुमति प्राप्त हुई थी।
शिक्षा और आदिवासी छात्रावासों से जुड़े सामाजिक संगठनों का कहना है कि मामला केवल नियुक्ति का नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा, अनुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही का है। ऐसे में पूरे मामले की समीक्षा कर स्पष्ट नीति सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की प्रशासनिक या सामाजिक स्थिति उत्पन्न न हो।
अब देखना यह होगा कि जनजाति कार्य विभाग इन सवालों का जवाब देता है या फिर अन्य मामलों की तरह यह मुद्दा भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
नोट- फिलहाल यह मुद्दा जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोगों की नजर अब विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया पर टिकी है। शासन के नियम निर्देश क्या है यह तो विभाग के अधिकारी ही बता पाएंगे हम तो सूत्रों की जानकारी एवं लोगों की चर्चाओं पर खबर आधारित है जिसकी पंचायत दिशा समाचार पुष्टि नहीं करते है








