जनजाति कार्य विभाग में ‘अटैचमेंट खेल’ का बड़ा सवाल, आखिर किसके संरक्षण में हो रही मनमानी?
चौरई आदिवासी बालक छात्रावास बना प्रयोगशाला! छह महीने में तीन अधीक्षक बदले, बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ के आरोप
छिंदवाड़ा (पंचायत दिशा समाचार) जिले का जनजाति कार्य विभाग इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवालों में घिरता नजर आ रहा है। विभाग में नियम-कायदों से ज्यादा “मेहरबानी और मनमर्जी” चलने के आरोप लग रहे हैं। खासकर चौरई स्थित आदिवासी बालक छात्रावास में अधीक्षकों की लगातार अदला-बदली ने विभागीय व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।
जानकारी के अनुसार पहले छात्रावास में पदस्थ अधीक्षक प्रसून गौतम पर बच्चों के राशन में कथित गड़बड़ी और गबन के आरोप लगे थे, जिसके बाद उन्हें निलंबित किया गया। कार्रवाई के बाद उम्मीद थी कि विभाग पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ व्यवस्था सुधारेगा, लेकिन इसके उलट नए सवाल खड़े हो गए।
प्रसून गौतम के बाद राजेश पाल को जिम्मेदारी सौंपी गई, मगर कुछ ही समय में उन्हें हटाकर संजय डेहरिया को अधीक्षक बना दिया गया। हैरानी की बात यह बताई जा रही है कि संजय डेहरिया पूर्व में मुख्यालय स्थित पिछड़ा वर्ग छात्रावास में लापरवाही के आरोपों के चलते निलंबित हो चुके थे। इसके बावजूद उन्हें फिर एक महत्वपूर्ण छात्रावास की जिम्मेदारी सौंप दी गई।
अब करीब एक महीने पहले संजय डेहरिया को भी चौरई से हटाकर छिंदवाड़ा स्थित जूनियर अनुसूचित जाति छात्रावास भेज दिया गया। लगातार हो रहे इन बदलावों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर विभाग में कोई स्थायी नीति है भी या नहीं?
सूत्रों के मुताबिक विभाग में “अटैचमेंट और पदस्थापना” का खेल लंबे समय से चल रहा है। चर्चा यह भी है कि जिला मुख्यालय में अटैचमेंट पर पदस्थ कुछ कर्मचारियों की भूमिका इन बदलावों में प्रभावशाली बनी हुई है। हालांकि इन चर्चाओं और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। आखिर छात्रावास के कार्य में लापरवाही करने वाले अधीक्षक जिन्हें निलंबित किया गया उन्हें बार-बार बदलकर दूसरे छात्रावास में क्यों अधीक्षक बनाया जा रहा है , जबकि उन्हें लापरवाही के कारण ही निलंबित किया गया था!
बसे बड़ा सवाल यह है कि जिन छात्रावासों में आदिवासी बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और भविष्य तय होना चाहिए, वहां प्रशासनिक अस्थिरता क्यों बनाई जा रही है? बार-बार अधीक्षक बदलने से छात्रावास की व्यवस्थाओं पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
अब स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने मांग उठाई है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि आखिर किन आधारों पर लगातार अधीक्षकों की नियुक्ति और हटाने की कार्रवाई की जा रही है। साथ ही विभागीय जवाबदेही तय करने की मांग भी तेज हो गई है।








