Home CITY NEWS रसोई से उठी बदलाव की लौ: एक शिक्षक ने सरकारी स्कूल को...

रसोई से उठी बदलाव की लौ: एक शिक्षक ने सरकारी स्कूल को बना दिया मिसाल..

रसोई से उठी बदलाव की लौ: एक शिक्षक ने सरकारी स्कूल को बना दिया मिसाल

रिपोर्ट रामकुमार राजपूत

पांढुर्णा (पंचायत दिशा समाचार)
जहां सरकारी स्कूलों की बदहाली अक्सर चर्चा में रहती है, वहीं पांढुर्णा विकासखंड का शासकीय प्राथमिक शाला मरकावाड़ा बदलाव की एक ऐसी मिसाल बनकर उभरा है, जिसने पूरे जिले का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह कहानी है एक शिक्षक के जुनून, सामूहिक प्रयास और नवाचार की—जो आज स्वर्गीय दशरथ नारायण पठाडे़ को समर्पित है।
जर्जर किचन से शुरू हुआ बदलाव
कुछ वर्ष पहले तक विद्यालय का किचन शेड अव्यवस्थित था, बच्चों की उपस्थिति कम थी और संसाधनों की कमी साफ नजर आती थी।लेकिन प्रधानमंत्री पोषण योजना के तहत शुरू हुए सुधारों ने तस्वीर बदल दी—
रसोई घर को स्वच्छ, सुव्यवस्थित और आकर्षक बनाया गया
दीवारों पर शैक्षणिक पेंटिंग और प्रेरक संदेश उकेरे गए
भोजन की गुणवत्ता और स्वच्छता को प्राथमिकता दी गई


परिणाम: बच्चों की उपस्थिति बढ़कर लगभग 90% तक पहुंच गई।
माँ की बगिया” ने बढ़ाई पहचान
विद्यालय में शुरू की गई किचन गार्डन पहल आज इसकी सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है।
2020 से 2026 के बीच करीब 250 किलो सब्जियों का उत्पादन
मिड-डे मील में ताजी और पौष्टिक सब्जियों का उपयोग
बच्चों में स्वावलंबन और प्रकृति से जुड़ाव
यह पहल स्व. श्री पठाडे़ की सोच और मेहनत का सशक्त उदाहरण है।
अब मॉडल स्कूल के रूप में पहचान
आज विद्यालय पूरी तरह बदली हुई तस्वीर पेश कर रहा है—
स्वच्छ और रंगीन परिसर
बच्चों के लिए अलग भोजन कक्ष
शुद्ध पेयजल और स्वच्छता की समुचित व्यवस्था
35 छात्र और 2 शिक्षक के साथ अनुशासित वातावरण
मेरा बूथ सबसे सुंदर” प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर स्कूल ने अपनी अलग पहचान बनाई है।
प्रेरणा छोड़ गए, खुद चले गए
08 अप्रैल 2026 को एक दुर्घटना में
स्व. दशरथ नारायण पठाडे़ का आकस्मिक निधन हो गया।
जिस शिक्षक ने इस स्कूल को नई दिशा दी,
आज वही इस सफलता को देखने के लिए मौजूद नहीं हैं।
उनकी कमी जरूर खलेगी, लेकिन
उनका किया गया काम हर दिन इस स्कूल में जिंदा रहेगा।

यह कहानी सिर्फ एक स्कूल की नहीं, बल्कि उस सोच की जीत है जो यह साबित करती है—
“अगर शिक्षक ठान ले, तो हालात बदलना तय है।”
स्व. श्री दशरथ नारायण पठाडे़ ने यह दिखा दिया कि
सरकारी स्कूल भी संसाधनों से नहीं, बल्कि सोच और समर्पण से महान बनते हैं।

यह प्रेरक गाथा शिक्षा जगत के लिए एक मजबूत संदेश है— बदलाव संभव है, बस पहल करने की जरूरत है।