Home CITY NEWS एक छात्रावास, तीन अधीक्षिकाएं! सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल..

एक छात्रावास, तीन अधीक्षिकाएं! सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल..

एक छात्रावास, तीन अधीक्षिकाएं! सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल
50 छात्राओं के लिए तीन-तीन अधीक्षिकाओं का प्रभार, दूरस्थ स्कूलों में शिक्षक संकट के बीच व्यवस्था पर उठे सवाल
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छिंदवाड़ा। जनजातीय कार्य विभाग की व्यवस्थाओं को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हुए हैं। जिला मुख्यालय स्थित आदिवासी पोस्ट मैट्रिक कन्या छात्रावास में करीब 50 छात्राओं के लिए तीन शिक्षिकाओं को अधीक्षिका का प्रभार दिए जाने की जानकारी सामने आई है। वहीं दूसरी ओर जिले के आदिवासी अंचलों के कई स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में एक ही छात्रावास में एक से अधिक अधीक्षिकाओं को जिम्मेदारी दिए जाने का औचित्य चर्चा का विषय बन गया है।

आदिवासी पोस्ट मैट्रिक कन्या छात्रावास में तीन अधीक्षिकाएं..

प्राप्त जानकारी के अनुसार कान्या शिक्षा परिसर स्थित आदिवासी पोस्ट मैट्रिक कन्या छात्रावास में उषा मालवी और रघुवंशी मैडम द्वारा अधीक्षिका का कार्य देखे जाने की बात सामने आई है। अब कवरेती मैडम को भी अधीक्षिका का प्रभार दिए जाने की जानकारी सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर एक ही छात्रावास में तीन अधीक्षिकाओं की आवश्यकता क्यों पड़ी?
यदि तीनों को अलग-अलग प्रशासनिक जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं तो उनके दायित्वों और आदेशों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। वहीं यदि एक ही पद का प्रभार एक से अधिक शिक्षिकाओं को दिया गया है तो इसके पीछे विभागीय नियम और प्रशासनिक आवश्यकता क्या है, यह जांच का विषय है।
स्कूल शिक्षक विहीन, मुख्यालय पर अतिरिक्त व्यवस्था?
मामले का दूसरा पहलू और भी महत्वपूर्ण है। आदिवासी बहुल दूरस्थ क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षकों की कमी की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब ग्रामीण और दूरस्थ स्कूलों को शिक्षकों की आवश्यकता है, तब जिला मुख्यालय पर कार्यरत शिक्षकों को छात्रावास जैसे गैर-शैक्षणिक दायित्वों में किस आधार पर लगाया जा रहा है।
क्या विभाग ने शिक्षकों की उपलब्धता और छात्रावास की आवश्यकता का कोई आकलन किया था? क्या तीनों शिक्षिकाओं के लिए अलग-अलग आदेश जारी किए गए हैं? इन सवालों का जवाब विभागीय दस्तावेजों से ही स्पष्ट हो सकेगा।
उपस्थिति और ड्यूटी को लेकर भी जांच जरूरी
मामले में यह आरोप भी सामने आया है कि कुछ अधीक्षिकाएं छात्रावास में उपस्थिति दर्ज कराने के बाद वहां से चली जाती हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, इसलिए इनकी सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
यदि ऐसी कोई अनियमितता पाई जाती है तो उपस्थिति पंजी, ड्यूटी रोस्टर, छात्रावास में वास्तविक उपस्थिति तथा संबंधित अधिकारियों के आदेशों की जांच के आधार पर जिम्मेदारी तय की जा सकती है। फिलहाल इन आरोपों को तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि जांच योग्य शिकायत के रूप में देखा जाना चाहिए।
सरकारी भुगतान की भी हो जांच
एक ही छात्रावास में तीन अधीक्षिकाओं को प्रभार दिए जाने की स्थिति में यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि किसे किस आदेश के तहत कौन-सा दायित्व सौंपा गया और इसके एवज में कोई अतिरिक्त मानदेय, भत्ता या अन्य शासकीय भुगतान किया जा रहा है या नहीं।
यदि विभागीय रिकॉर्ड में तीनों की नियुक्ति अथवा प्रभार की पुष्टि होती है तो संबंधित आदेशों, कार्य-विभाजन और भुगतान अभिलेखों की जांच से पूरी स्थिति सामने आ सकती है।
सहायक आयुक्त बोले—“मामला दिखाता हूं”
मामले को लेकर जब जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त से जानकारी ली गई तो उन्होंने कहा कि वे मामले को दिखवाएंगे। उनका कहना था कि यदि एक से अधिक शिक्षिकाओं की अधीक्षिका के रूप में पदस्थापना/प्रभार हुआ है, तो दो शिक्षिकाओं को तत्काल उनकी मूल शाला में वापस भेजा जाएगा।
सहायक आयुक्त के इस बयान के बाद अब विभागीय कार्रवाई पर नजर रहेगी। हालांकि वास्तविक स्थिति संबंधित आदेशों और विभागीय रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

क्षेत्र संयोजक का कहना है..
जब इस विषय में क्षेत्र संयोजक से दूरभाष में बात हुई तो उनका कहना है कि दो का मुझे मालूम है तीसरी अधीक्षिका की नियुक्ति कब हुई पता करके बताती हूं

अधीक्षिका से संपर्क का प्रयास, नहीं मिला जवाब
मामले में संबंधित अधीक्षिका का पक्ष जानने के लिए फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन फोन रिसीव नहीं हुआ। उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी। उनका पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
कलेक्टर से जांच की मांग
मामले में जिला प्रशासन से मांग की जा रही है कि छात्रावास से संबंधित प्रभार आदेश, पदस्थापना आदेश, उपस्थिति पंजी, ड्यूटी रोस्टर, कार्य-विभाजन, वेतन/मानदेय संबंधी अभिलेख तथा छात्रावास में वास्तविक ड्यूटी की जांच कराई जाए।
साथ ही यह भी जांच की जानी चाहिए कि जिले के कितने शिक्षक अपनी मूल शाला से हटकर जिला मुख्यालय अथवा अन्य कार्यालयों/छात्रावासों में कार्यरत हैं और उन्हें वहां रखने के लिए कौन-कौन से आदेश जारी किए गए हैं।