कुपोषण की चपेट में बचपन: सरकारी दावों के बीच 4.5 किलो का मासूम
नहीं थम रहा कुपोषण का सिलसिला, दो वक्त के पौष्टिक आहार के लिए तरसता बचपन
तामिया के सुदूर गांव की तस्वीर ने खोली व्यवस्था की जमीनी हकीकत
छिंदवाड़ा। कुपोषण मिटाने के लिकुपोषण की चपेट में बचपन: सरकारी दावों के बीच 4.5 किलो का मासूमए सरकारी योजनाओं और अभियानों पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी कई सवाल खड़े कर रही है। आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में आज भी ऐसे बच्चे मौजूद हैं, जिनके लिए पर्याप्त और पौष्टिक भोजन किसी सपने से कम नहीं है। तामिया ब्लॉक के सुदूर गंगवानी गांव का एक वर्षीय मासूम अतुल इस गंभीर समस्या की मार झेलता नजर आया। मां का साया सिर से उठने के बाद अतुल गंभीर बीमारी और अति-कुपोषण की स्थिति से जूझ रहा था। हालत इतनी खराब थी कि उसका वजन महज 4.5 किलो रह गया था। बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी उसकी वृद्ध दादी के कंधों पर आ गई। बताया गया कि गत 27 जुलाई को दादी अपने मासूम पोते को लेकर जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) पहुंचीं।

14 दिन के उपचार से बढ़ा वजन
NRC में करीब 14 दिनों तक उपचार और पोषण प्रबंधन के बाद अतुल के स्वास्थ्य में सुधार आया। संक्रमण को नियंत्रित करने के साथ नियमित पोषण और चिकित्सकीय निगरानी से उसका वजन बढ़कर करीब 5.5 किलो हो गया। पोषण प्रशिक्षक अंकिता साहू और चिकित्सक डॉ. एल.एन. साहू सहित केंद्र के स्टाफ की देखरेख में बच्चे का उपचार किया गया।
बच्चे की हालत में सुधार निश्चित रूप से राहत देने वाली खबर है, लेकिन अतुल की कहानी सिर्फ एक बच्चे के स्वस्थ होने की कहानी नहीं है। यह उन सवालों को भी सामने लाती है, जिनका जवाब व्यवस्था को देना होगा।
सवाल—समय रहते क्यों नहीं पहुंची मदद?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में आंगनवाड़ी केंद्रों, स्वास्थ्य विभाग और पोषण अभियानों का पूरा नेटवर्क मौजूद है, तो अतुल जैसे बच्चे गंभीर कुपोषण की स्थिति तक कैसे पहुंच रहे हैं?
क्या नियमित रूप से बच्चों के वजन और स्वास्थ्य की निगरानी हो रही है?
क्या अति-कुपोषित बच्चों की समय पर पहचान की जा रही है?
क्या आंगनवाड़ी और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के स्तर पर ऐसे बच्चों की लगातार मॉनिटरिंग हो रही है?
और सबसे अहम—अगर परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर है तो सरकार की पोषण योजनाओं का लाभ उस परिवार तक समय पर क्यों नहीं पहुंचता?
नागर सिंह चौहान मंत्री अनुसूचित जाति कल्याण विभाग मध्यप्रदेश शासन
एक बच्चे की कहानी, व्यवस्था के लिए चेतावनी
अतुल की दादी ने जिस तरह अपने पोते को संभाला, वह परिवार के संघर्ष की तस्वीर है। लेकिन किसी वृद्ध महिला को अपने स्तर पर व्यवस्था से जूझते हुए बच्चे की जान बचाने की नौबत नहीं आनी चाहिए। कुपोषण केवल भोजन की कमी का मुद्दा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, जागरूकता, गरीबी और सरकारी योजनाओं की जमीनी पहुंच से जुड़ा गंभीर विषय है।
सरकारी योजनाओं की सफलता का आकलन विज्ञापनों और कागजी आंकड़ों से नहीं, बल्कि गांव के अंतिम बच्चे की सेहत से होना चाहिए। यदि एक वर्षीय बच्चा गंभीर कुपोषण की स्थिति में पहुंच रहा है, तो यह पूरे सिस्टम के लिए आत्ममंथन का समय है।
अतुल अब स्वस्थ होने की राह पर है, लेकिन सवाल अभी जिंदा है—क्या व्यवस्था ऐसे दूसरे बच्चों तक संकट गहराने से पहले पहुंचेगी?







