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अटैचमेंट के खेल में पिस रहे आदिवासी बच्चे, शिक्षक स्कूल से बाहर और बच्चे शिक्षक विहीन

अटैचमेंट के खेल में पिस रहे आदिवासी बच्चे, शिक्षक स्कूल से बाहर और बच्चे शिक्षक विहीन
प्राथमिक शाला हेटी के शिक्षक सुरेन्द्र भांगे वर्ष 2009 से बड़ौसा हायर सेकेंडरी स्कूल में अटैच, कर रहे बाबूगिरी

बिसनपुर प्राथमिक शाला की शिक्षिका प्रीति राऊत 2022 से सौसर के उत्कृष्ट कन्या छात्रावास में अधीक्षिका के पद पर अटैचमेंट में पदस्थ..?

छिंदवाड़ा। जिले के आदिवासी अंचलों में सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कहीं स्कूल शिक्षक विहीन हैं तो कहीं एक-दो शिक्षकों के भरोसे पांच-पांच कक्षाओं का संचालन किया जा रहा है। दूसरी ओर विभागीय व्यवस्था में लंबे समय से अटैचमेंट पर रहने वाले शिक्षक और शिक्षिकाएं स्कूलों में पढ़ाने के बजाय कार्यालयीन कार्य अथवा छात्रावासों में अधीक्षक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
ऐसे ही एक मामले में प्राथमिक शाला हेटी में पदस्थ शिक्षक सुरेन्द्र भांगे के वर्ष 2009 से बड़ौसा उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में अटैचमेंट पर रहकर बाबूगिरी किए जाने की जानकारी सामने आई है। सवाल यह है कि जब शासन ने शिक्षकों की नियुक्ति बच्चों को पढ़ाने के लिए की है, तो वर्षों से उन्हें मूल पदस्थापना से हटाकर अन्य कार्यों में लगाए जाने की व्यवस्था आखिर किसके आदेश और किस नियम के तहत जारी है?


एक तरफ शिक्षक अटैच, दूसरी तरफ स्कूलों में शिक्षकों का टोटा
जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। कई स्थानों पर अतिथि शिक्षकों के सहारे कक्षाएं संचालित होने की स्थिति बताई जा रही है। ऐसे में लंबे समय से शिक्षकों को स्कूलों से हटाकर कार्यालयों अथवा छात्रावासों में लगाए जाने की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आरोप है कि विकासखंड स्तर पर बैठे बीईओ से लेकर जिला स्तर के अधिकारियों तक इस व्यवस्था की जानकारी होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही है। इससे सबसे बड़ा नुकसान उन ग्रामीण और आदिवासी विद्यार्थियों का हो रहा है, जिनके लिए सरकारी स्कूल ही शिक्षा का मुख्य माध्यम हैं।


बिसनपुर स्कूल का मामला भी बना सवाल
बिछुआ विकासखंड के बिसनपुर प्राथमिक शाला में पदस्थ शिक्षिका प्रीति राऊत को 18 सितंबर 2022 को सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य विभाग के आदेश से स्कूल से हटाकर सौसर उत्कृष्ट कन्या छात्रावास में अधीक्षिका की जिम्मेदारी दिए जाने का मामला भी चर्चा में है।
बताया जा रहा है कि शिक्षिका के हटने के बाद बिसनपुर स्कूल में शिक्षकों की उपलब्धता और पांच कक्षाओं के संचालन की स्थिति पर गंभीर असर पड़ा। सवाल यह है कि किसी शिक्षक को दूसरी जिम्मेदारी देने से पहले विभाग ने क्या यह जांचा कि संबंधित स्कूल में कितने शिक्षक उपलब्ध हैं और शिक्षक के हटने के बाद बच्चों की पढ़ाई किस व्यवस्था से चलेगी?
शिकायतों के बाद भी मूल स्कूल में वापसी क्यों नहीं?
अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि शिक्षिका प्रीति राऊत की छात्रावास में प्रतिनियुक्ति/अटैचमेंट की आवश्यकता समाप्त हो चुकी है, तो उन्हें उनकी मूल पदस्थापना बिसनपुर प्राथमिक शाला में वापस क्यों नहीं भेजा जा रहा है?
ग्रामीणों और विद्यार्थियों से जुड़े लोगों का कहना है कि जब स्कूल में शिक्षकों की कमी हो और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही हो, तब विभाग को प्राथमिकता तय करनी चाहिए। शिक्षक का मूल दायित्व विद्यार्थियों को पढ़ाना है, न कि वर्षों तक किसी अन्य कार्यालयीन या छात्रावासीय व्यवस्था में पदस्थ रहना।
आदिवासी बच्चों की शिक्षा से बड़ा क्या?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जनजातीय कार्य विभाग में वर्षों पुराने अटैचमेंट कब समाप्त होंगे? यदि शासन के नियम शिक्षकों को उनके मूल शैक्षणिक दायित्व के लिए नियुक्त करते हैं, तो फिर लंबे समय से चल रहे ऐसे अटैचमेंट की समीक्षा कब होगी?
आदिवासी समाज के विद्यार्थियों और अभिभावकों की मांग है कि जिला प्रशासन एवं जनजातीय कार्य विभाग जिले में वर्षों से चल रहे सभी शिक्षक अटैचमेंट की निष्पक्ष समीक्षा करे। जिन स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, वहां तत्काल शिक्षकों की वापसी कराई जाए, ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी आदिवासी समाज के बच्चों की इस पुकार को कब सुनते हैं और जनजातीय कार्य विभाग में वर्षों से चली आ रही अटैचमेंट व्यवस्था पर कब निर्णायक कार्रवाई होती है।

टीप: इस समाचार में उपलब्ध दस्तावेजों एवं प्राप्त जानकारी के आधार पर विषय से जुड़े प्रश्न एवं पक्ष प्रस्तुत किए गए हैं। संबंधित शिक्षक, अधिकारी अथवा जनजातीय कार्य विभाग का अभिमत/पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी यथोचित प्रमुखता के साथ निष्पक्ष रूप से प्रकाशित किया जाएगा। समाचार का उद्देश्य किसी व्यक्ति अथवा संस्था की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के शैक्षणिक हित एवं संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े विषयों को सामने लाना है।