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मरम्मत के नाम पर जनजातीय के छात्रावास में खानापूर्ति, कागजों में पूरा काम!

मरम्मत के नाम पर खानापूर्ति, कागजों में पूरा काम!

सौसर के आदिवासी छात्रावासों में पुराने काम के बिल से राशि निकालने के आरोप, भौतिक सत्यापन की मांग

छिंदवाड़ा/सौसर। जनजातीय कार्य विभाग के अधीन संचालित सीनियर आदिवासी बालक एवं कन्या उत्कृष्ट छात्रावासों में मरम्मत कार्य के नाम पर कथित अनियमितताओं का मामला सामने आया है। आरोप है कि छात्रावासों में मरम्मत के नाम पर वर्ष 2024 में इन छात्रावास  में स्वीकृत राशि खर्च तो कागजों में दिखाई गई, लेकिन मौके पर अपेक्षित कार्य नजर नहीं आ रहा। कुछ स्थानों पर केवल पुताई जैसे काम कराकर बड़ी राशि खर्च किए जाने की बात सामने आ रही है।

पुराने काम का बिल लगाकर राशि निकालने का आरोप

स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोपों के अनुसार, कुछ कार्यों में पूर्व में हो चुके काम को ही दोबारा मरम्मत कार्य दर्शाकर भुगतान प्राप्त किया गया। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सरकारी राशि के उपयोग और विभागीय निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

मामले में ठेकेदार, छात्रावास अधीक्षक और विभागीय इंजीनियर की भूमिका की जांच की मांग उठ रही है। साथ ही प्रत्येक छात्रावास में स्वीकृत कार्य, वास्तविक कार्य और भुगतान की राशि का मिलान किए जाने की जरूरत है।

बिना मांग के भी करा दिए गए काम?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन छात्रावासों में मरम्मत कार्य कराया गया, वहां इसकी वास्तविक आवश्यकता कितनी थी? क्या छात्रावास अधीक्षकों द्वारा बाकायदा मरम्मत की मांग भेजी गई थी या विभागीय स्तर से ही कार्य स्वीकृत कर दिए गए?

यदि बिना मांग और बिना वास्तविक आवश्यकता के राशि खर्च की गई है तो इसकी जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।

एक साल पुराने भवन में भी मरम्मत की राशि!

वर्ष 2024 में जनजातीय कार्य विभाग द्वारा जिले के करीब 50 छात्रावासों में मरम्मत कार्य कराए जाने की जानकारी सामने आई है। इसी कड़ी में सीनियर आदिवासी बालक छात्रावास कुंडा और धोधरी जैसे छात्रावासों को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, जहां भवन अपेक्षाकृत नया होने के बावजूद मरम्मत के नाम पर राशि खर्च किए जाने की बात कही जा रही है।

सवाल यह है कि यदि भवन करीब एक वर्ष पहले ही नया बना था तो इतनी जल्दी उसमें ऐसी कौन-सी मरम्मत की जरूरत पड़ गई कि सरकारी राशि फिर से खर्च करनी पड़ी?

भौतिक सत्यापन से खुल सकता है पूरा मामला

मामले की निष्पक्ष जांच के लिए सभी संबंधित छात्रावासों का स्थल निरीक्षण और भौतिक सत्यापन कराया जाना जरूरी है। स्वीकृत एस्टीमेट, वर्क ऑर्डर, एमबी, बिल-वाउचर, भुगतान विवरण और मौके पर हुए वास्तविक कार्य का मिलान किया जाए तो कथित अनियमितताओं की तस्वीर साफ हो सकती है।

जांच के प्रमुख सवाल

  • किस छात्रावास में कितनी राशि स्वीकृत हुई?
  • किस काम के लिए कितनी राशि का भुगतान किया गया?
  • मरम्मत कार्य की मांग किसने भेजी थी?
  • क्या काम शुरू होने से पहले स्थल निरीक्षण किया गया?
  • क्या पुराने कार्य को ही दोबारा दिखाकर भुगतान किया गया?
  • नए भवनों में मरम्मत की आवश्यकता किस आधार पर तय हुई?
  • काम की गुणवत्ता की जांच किस अधिकारी ने की?
  • क्या विभागीय इंजीनियर ने मौके पर जाकर एमबी और कार्य की पुष्टि की?

अब सवाल सिर्फ मरम्मत का नहीं, बल्कि सरकारी राशि के सही इस्तेमाल और विभागीय जवाबदेही का है। यदि आरोप निराधार हैं तो विभाग को दस्तावेज और भौतिक सत्यापन के जरिए स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, और यदि अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों, कर्मचारियों और संबंधित ठेकेदार पर नियमानुसार कार्रवाई होना चाहिए।