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आदिवासी बच्चों की जान से खिलवाड़! जर्जर आश्रम में चल रहा निर्माण, मलबे के बीच रहने को मजबूर मासूम..!

आदिवासी बच्चों की जान से खिलवाड़! जर्जर आश्रम में चल रहा निर्माण, मलबे के बीच रहने को मजबूर मासूम

दो साल से मरम्मत के नाम पर लाखों की निकासी, फिर भी छत टूटी, कमरों में मलबा, शौचालय अधूरा… आखिर जिम्मेदार कौन?
रिपोर्ट – रामकुमार राजपूत | छिंदवाड़ा
छिंदवाड़ा जिले के परासिया विकासखंड स्थित आदिवासी बालक आश्रम अंबाड़ा की तस्वीरें जनजातीय कार्य विभाग के दावों की पोल खोलती नजर आ रही हैं। तस्वीरों में कहीं छत पूरी तरह टूटी हुई दिखाई दे रही है, कहीं लोहे की सरिया खुली हुई है, तो कहीं कमरों में मलबे का ढेर लगा है। आरोप है कि ऐसे हालात के बावजूद छात्र इसी परिसर में रह रहे हैं।


बारिश के मौसम में जब किसी भी जर्जर भवन में रहना जोखिम भरा माना जाता है, तब आश्रम की छत तोड़कर मरम्मत कराई जा रही है। सवाल यह है कि यदि भवन इतना ही जर्जर था तो बच्चों को पहले सुरक्षित स्थान पर क्यों नहीं भेजा गया?


दो साल से मरम्मत… लेकिन नतीजा शून्य
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस भवन की मरम्मत का कार्य पिछले लगभग दो वर्षों से चल रहा है। इस दौरान लाखों रुपये खर्च किए जाने की बात कही जा रही है, लेकिन आज भी भवन की हालत खस्ताहाल है। तस्वीरों में छत उखड़ी हुई, कमरों में मलबा, अधूरे शौचालय और बिखरा निर्माण कार्य साफ दिखाई देता है।


ठेकेदार बदलते रहे, भुगतान चलता रहा!
आरोप है कि पहले ठेकेदार ने अधूरा काम छोड़ दिया और अब दूसरे ठेकेदार के माध्यम से कार्य कराया जा रहा है। इसके बावजूद आश्रम की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा। आरोप यह भी हैं कि गुणवत्ता की जांच और स्थल निरीक्षण किए बिना भुगतान किए गए। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना शेष है।


तस्वीरें खुद बयां कर रही हैं हालात
कमरों में मलबे के ढेर पड़े हैं।
छत का बड़ा हिस्सा टूटा हुआ दिखाई देता है।
लोहे की सरिया खुली नजर आ रही है।
शौचालय निर्माण अधूरा दिखाई देता है।
फर्नीचर और सरकारी सामग्री धूल-मिट्टी व अव्यवस्था के बीच रखी हुई नजर आती है।
ऐसे माहौल में विद्यार्थियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।


उठ रहे बड़े सवाल
क्या जनजातीय कार्य विभाग ने बच्चों की सुरक्षा को नजरअंदाज किया?
दो वर्षों में मरम्मत पर कितना खर्च हुआ और उसका लाभ क्या मिला?
भुगतान से पहले किस अधिकारी ने गुणवत्ता का परीक्षण किया?
क्या बारिश के बीच इस तरह का निर्माण कार्य नियमों के अनुरूप है?
यदि भवन रहने योग्य नहीं था तो छात्रों की वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?


यदि तस्वीरों में दिख रही स्थिति वर्तमान और वास्तविक है, तो यह मामला केवल निर्माण कार्य की लापरवाही का नहीं, बल्कि आदिवासी विद्यार्थियों की सुरक्षा, सरकारी धन के उपयोग और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय है। अब सभी की नजर जिला प्रशासन और जनजातीय कार्य विभाग की कार्रवाई पर रहेगी।