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घाटलिंगा आश्रम में बच्चों से खाना बनवाने का आरोप.. सोशल मडिया में वायरल फोटो…

घाटलिंगा आश्रम में बच्चों से खाना बनवाने का आरोप

सोशल मीडिया पर फोटो-वीडियो वायरल, जनजातीय कार्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल

मीडिया प्रवेश पर रोक के बीच सवाल—अगर पत्रकार अंदर नहीं जाएंगे तो छात्रावासों की हकीकत सामने कैसे आएगी?

छिंदवाड़ा/तामिया। आदिवासी अंचलों में संचालित आश्रम शालाओं एवं छात्रावासों में बच्चों को बेहतर शिक्षा, पौष्टिक भोजन और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने के लिए शासन द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद तामिया क्षेत्र के घाटलिंगा आदिवासी बालक आश्रम से सामने आई तस्वीरो ने व्यवस्थाओं की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि वायरल फोटो कब की इसकी पंचायत दिशा समाचार पुष्टि नहीं करता है। यह तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हुई है

सोशल मीडिया पर वायरल फोटो में कुछ बच्चे भोजन बनाते हुए दिखाई दे रहे हैं। आश्रम में रहने वाले बच्चों से स्कूल से लौटने के बाद भोजन बनाने सहित अन्य काम कराए जाते हैं। यदि यह आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह न केवल आश्रम की व्यवस्था, बल्कि बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और देखभाल की निगरानी पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।

बच्चों के हाथ में किताबें होनी चाहिए या रसोई के बर्तन?

आश्रम में रहने वाले बच्चों की प्राथमिक जिम्मेदारी शिक्षा ग्रहण करना है। भोजन बनाने, सफाई और अन्य व्यवस्थाओं के लिए शासन द्वारा कर्मचारियों की व्यवस्था किए जाने का दावा किया जाता है। ऐसे में बच्चों से नियमित रूप से भोजन बनवाए जाने की शिकायत सामने आना विभागीय निगरानी तंत्र के लिए जांच का विषय है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि आश्रम में ऐसी गतिविधियां चल रही थीं तो क्षेत्रीय निगरानी तंत्र और विभागीय निरीक्षण के दौरान यह स्थिति अधिकारियों की नजर में क्यों नहीं आई?

अधीक्षक रक्षा डेहरिया ने बताया..

जब इस वायरल फोटो पर घाटलिंग अधीक्षक रक्षा डेहरिया से बात की गई तो उनका कहना है कि वायरल फोटो 2 साल पुरानी है । किसी ने ये फोटो अभी वायरल किया है। इस मामले में मुझ पर पहले भी कार्रवाई चुकी है। यह फोटो अभी की नहीं है 2 साल पुराना मामला है।

पहले भी विवादों में रहा आश्रम, फिर निगरानी पर सवाल

शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि संबंधित अधीक्षक के खिलाफ पूर्व में भी कार्रवाई हो चुकी है और आश्रम की व्यवस्थाओं को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। लेकिन यदि पूर्व शिकायतों के बावजूद दोबारा बच्चों से काम कराने जैसी तस्वीर सामने आती है, तो विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि पिछली कार्रवाई के बाद निगरानी और व्यवस्था सुधारने के लिए क्या कदम उठाए गए थे।

सहायक आयुक्त से लेकर क्षेत्रीय निगरानी दल तक सवालों के घेरे में

घाटलिंगा की घटना केवल एक आश्रम के अधीक्षक तक सीमित नहीं मानी जा सकती। यदि जांच में बच्चों से भोजन बनवाने की पुष्टि होती है तो यह सवाल भी उठेगा कि जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त, क्षेत्र संयोजक और निरीक्षण/निगरानी दल द्वारा आश्रमों की वास्तविक स्थिति की कितनी प्रभावी निगरानी की जा रही है।

क्या निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित है या अधिकारियों द्वारा बच्चों से सीधे बातचीत कर वास्तविक स्थिति भी जानी जाती है?
क्या भोजन व्यवस्था का भौतिक सत्यापन होता है?
क्या रसोइया एवं अन्य स्वीकृत कर्मचारियों की नियमित उपस्थिति जांची जाती है?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या निरीक्षण के दौरान बच्चों से उनकी समस्याओं के बारे में स्वतंत्र रूप से पूछा जाता है?

इन सवालों का जवाब विभाग को देना चाहिए।

मंत्री के आदेश के बाद एक और बड़ा सवाल—मीडिया की निगरानी कैसे होगी?

हाल ही में छात्रावासों में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश को लेकर शासन स्तर से निर्देश जारी किए गए हैं। बच्चों की सुरक्षा और छात्रावास की व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से ऐसे निर्देशों की आवश्यकता समझी जा सकती है। लेकिन इसके साथ पारदर्शिता और स्वतंत्र निगरानी का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यदि पत्रकारों और मीडिया प्रतिनिधियों को छात्रावासों में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी, तो वहां की वास्तविक स्थिति सामने कैसे आएगी?

बेशक सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर किसी भी व्यक्ति को बिना अनुमति प्रवेश देना उचित नहीं हो सकता। लेकिन ऐसी व्यवस्था भी जरूरी है जिसमें मान्यता प्राप्त पत्रकारों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और निरीक्षण योग्य जानकारी तक पहुंच का अवसर मिले।

क्योंकि सरकारी निरीक्षण अपनी जगह है, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारिता भी समाज के सामने सरकारी संस्थानों की जमीनी स्थिति रखने का एक माध्यम है।

दरवाजे बंद होंगे तो सवाल अंदर ही रह जाएंगे!

घाटलिंगा की वायरल तस्वीरें एक बड़ा सवाल छोड़ती हैं—यदि बच्चों से वास्तव में खाना बनवाया जा रहा था, तो विभागीय निरीक्षण में यह स्थिति क्यों नहीं पकड़ी गई?

और यदि भविष्य में मीडिया को छात्रावासों के अंदर जाने की अनुमति नहीं होगी, तो ऐसी तस्वीरें और शिकायतें सामने आने का माध्यम क्या होगा?

सिर्फ सरकारी निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर व्यवस्थाओं को ठीक मान लेना पर्याप्त नहीं हो सकता। बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों से जुड़े संस्थानों में जवाबदेही, पारदर्शिता और स्वतंत्र निगरानी तीनों जरूरी हैं।

कलेक्टर से तत्काल जांच की मांग

स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं ने जिला प्रशासन से घाटलिंगा आदिवासी बालक आश्रम की तत्काल निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। मांग की गई है कि जांच के दौरान बच्चों के बयान, भोजन व्यवस्था, रसोइया एवं अन्य कर्मचारियों की उपस्थिति, आश्रम की उपस्थिति पंजिका, निरीक्षण रजिस्टर, उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज तथा वायरल फोटो-वीडियो की भी जांच की जाए।

यदि बच्चों से नियमित रूप से भोजन बनवाने या अन्य अनुचित कार्य कराने की पुष्टि होती है तो जिम्मेदारों पर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

अब जवाबदेही विभाग की

घाटलिंगा की तस्वीरें केवल एक वायरल फोटो या वीडियो का मामला बनकर न रह जाएं। मामला बच्चों की शिक्षा, भोजन, सुरक्षा और सरकारी व्यवस्था से जुड़ा है। इसलिए प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि आश्रम में बच्चों से खाना बनवाया गया या नहीं, यदि बनाया गया तो किसके निर्देश पर, वहां नियुक्त कर्मचारी क्या कर रहे थे और संबंधित अधिकारियों की निगरानी के बावजूद यह स्थिति सामने क्यों नहीं आई।

साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि छात्रावासों में सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर मीडिया की पहुंच किस प्रक्रिया के तहत सीमित की गई है और स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से सामने आने वाली शिकायतों की जांच के लिए वैकल्पिक पारदर्शी व्यवस्था क्या होगी।

रिपोर्ट / ठा. रामकुमार राजपूत

टीप: समाचार में उल्लेखित सोशल मीडिया पर वायरल फोटो- के आधार पर हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि समाचार प्रकाशन के समय नहीं हुई है। एवं पंचायत दिशा समाचार इसकी पुष्टि नहीं करता ,संबंधित अधीक्षक एवं जनजातीय कार्य विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।