Home Uncategorized तीन महीने से खाद्यान्न का इंतजार, जिम्मेदार अधिकारी आखिर क्यों मौन?

तीन महीने से खाद्यान्न का इंतजार, जिम्मेदार अधिकारी आखिर क्यों मौन?

तीन महीने से खाद्यान्न का इंतजार, जिम्मेदार अधिकारी आखिर क्यों मौन?
जनजातीय कार्य विभाग के छात्रावासों में राशन संकट का दावा, अधीक्षक बोले—बच्चों का भोजन चलाने अपनी जेब से खरीद रहे खाद्यान्न
गरीब आदिवासी बच्चों की थाली पर संकट, छिंदवाड़ा में खाद्यान्न व्यवस्था की निगरानी पर उठे गंभीर सवाल

रिपोर्ट -रामकुमार राजपूत

मोबाइल-8989115284
छिंदवाड़ा। जनजातीय कार्य विभाग द्वारा संचालित छात्रावासों और आश्रम शालाओं में रहने वाले गरीब आदिवासी विद्यार्थियों के भोजन की व्यवस्था को लेकर गंभीर स्थिति सामने आने का दावा किया जा रहा है। संबंधित अधीक्षकों के अनुसार, करीब तीन महीने से छात्रावासों को नियमित खाद्यान्न उपलब्ध नहीं हो रहा है। इसके चलते छात्रावासों की भोजन व्यवस्था प्रभावित होने का खतरा बना हुआ है।
सबसे गंभीर बात यह है कि जिन छात्रावासों में आर्थिक रूप से कमजोर आदिवासी परिवारों के बच्चे रहकर पढ़ाई करते हैं, वहां भोजन की व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी अधीक्षकों पर है। लेकिन यदि विभागीय स्तर से खाद्यान्न ही उपलब्ध नहीं कराया जाएगा तो अधीक्षक आखिर बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था कैसे संचालित करेंगे?
खाद्यान्न नहीं मिला तो अधीक्षक अपनी जेब से चला रहे व्यवस्था!
अधीक्षकों का दावा है कि सरकारी खाद्यान्न की आपूर्ति नहीं होने के बावजूद बच्चों के भोजन की व्यवस्था बंद नहीं की जा सकती। इसलिए उन्हें स्थानीय निजी दुकानों से बाजार भाव पर राशन खरीदना पड़ रहा है। एक अधीक्षक ने तो अपनी वेतन राशि से खाद्यान्न खरीदकर व्यवस्था चलाने की बात कही है।
सवाल यह है कि सरकारी छात्रावास की भोजन व्यवस्था का भार क्या अब अधीक्षकों की व्यक्तिगत जेब पर डाल दिया गया है?
छिंदवाड़ा में बैठे खाद्यान्न से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

तीन महीने से खाद्यान्न उपलब्ध नहीं होने के दावे के बावजूद संबंधित अधिकारियों द्वारा इस समस्या का समाधान क्यों नहीं किया गया, यह बड़ा सवाल है। खाद्यान्न की मांग, आवंटन, उठाव और छात्रावासों तक आपूर्ति की निगरानी आखिर किस अधिकारी की जिम्मेदारी है?
यदि खाद्यान्न का आवंटन हुआ है तो वह छात्रावासों तक क्यों नहीं पहुंचा?
यदि आवंटन नहीं हुआ तो इसकी वजह क्या है?
यदि आपूर्ति प्रक्रिया में अड़चन है तो उसे दूर करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए?
और सबसे महत्वपूर्ण—तीन महीने से चल रही इस स्थिति की जानकारी विभागीय अधिकारियों को थी या नहीं?
गरीब आदिवासी बच्चों की थाली से जुड़ा मामला
यह केवल राशन की आपूर्ति का मामला नहीं है। छात्रावासों और आश्रम शालाओं में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए भोजन उनकी बुनियादी जरूरत है। ऐसे में खाद्यान्न आपूर्ति में लंबे समय तक कथित बाधा व्यवस्था की गंभीरता पर सवाल खड़े करती है।
अगर अधीक्षक अपनी जेब से राशन खरीदकर व्यवस्था संभाल रहे हैं, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उन्होंने अब तक कितना खर्च किया और उस राशि की प्रतिपूर्ति की जिम्मेदारी किसकी होगी।
अधिकारी जवाब देंकहां अटका है तीन महीने का खाद्यान्न?
जनजातीय कार्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को अब स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। जिले में कितने छात्रावास और आश्रम शालाएं खाद्यान्न की कमी से प्रभावित हैं? कितने समय से आपूर्ति बाधित है? संबंधित खाद्यान्न का आवंटन और वितरण कब हुआ? और यदि अधीक्षकों ने निजी स्तर पर खाद्यान्न खरीदा है तो उनके खर्च का क्या होगा?
तीन महीने तक खाद्यान्न नहीं पहुंचने के दावे ने विभाग की आपूर्ति और निगरानी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। गरीब आदिवासी बच्चों के लिए संचालित छात्रावासों में यदि राशन व्यवस्था सुचारू नहीं है तो इसकी जवाबदेही तय होना जरूरी है।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार खाद्यान्न अधिकारी इस मामले को गंभीरता से लेते हैं या फिर अधीक्षकों को अपनी जेब से राशन खरीदकर ही छात्रावास चलाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।