
जनजाति कार्य विभाग में ‘स्टे’ का सहारा! निलंबित अधीक्षक फिर भी संभाल रहे छात्रावास और आश्रम शालाएं?
सिल्लेवानी बालक आश्रम शाला में बच्चे की मौत के बाद भी नहीं चेता विभाग, गंभीर आरोपों और लापरवाही के मामलों पर उठे सवाल
छिंदवाड़ा। जनजातीय कार्य विभाग छिंदवाड़ा की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। विभागीय कार्रवाई के बावजूद कई छात्रावासों और आश्रम शालाओं में निलंबित अथवा कार्रवाई का सामना कर रहे अधीक्षकों के कार्य करने संबंधी शिकायतें सामने आ रही हैं। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर विभाग अपने ही आदेशों को प्रभावी ढंग से लागू कराने में क्यों असफल दिखाई दे रहा है?
सबसे गंभीर मामला सिल्लेवानी बालक आश्रम शाला से जुड़ा बताया जा रहा है, जहां एक दुर्घटना में आश्रम शाला में निवासरत एक बच्चे की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद अधीक्षक की जिम्मेदारी और आश्रम शाला प्रबंधन की व्यवस्थाओं पर सवाल उठे थे। इसके बावजूद विभाग की आगे की कार्रवाई और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर अब भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
निलंबन के बाद भी अधीक्षक की जिम्मेदारी?
जनजातीय कार्य विभाग में यह चर्चा लगातार तेज है कि कई मामलों में अधीक्षक निलंबित होने के बावजूद न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त कर पुनः पदों पर बने हुए हैं या विभागीय व्यवस्थाओं में उनकी भूमिका बनी हुई है। आरोप है कि ऐसे मामलों में विभाग न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने में सफल नहीं हो पा रहा है।
बताया जाता है कि कुछ छात्रावास एवं आश्रम शालाओं में ऐसे अधिकारी और कर्मचारी लंबे समय से विभागीय कार्रवाई अथवा निलंबन की स्थिति के बावजूद सेवा में बने हुए हैं। कहीं-कहीं यह अवधि एक से दो वर्ष तक पहुंचने की चर्चा है।
अब बड़ा सवाल यह है कि—
यदि किसी अधिकारी के खिलाफ गंभीर विभागीय कार्रवाई की गई थी, तो वह कार्रवाई आखिर प्रभावी क्यों नहीं हो सकी?
‘कोर्ट से स्टे’ और विभाग की कमजोर पैरवी पर सवाल
जनजातीय कार्य विभाग में न्यायालय से स्थगन आदेश लेकर विभागीय कार्रवाई से राहत पाने का सिलसिला चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि आखिर छिंदवाड़ा का जनजातीय कार्य विभाग न्यायालयों में अपना पक्ष मजबूती से रखने के लिए क्या पर्याप्त तैयारी करता है?
कानूनी जानकारों के अनुसार, किसी भी विभागीय मामले में दस्तावेजों की मजबूती, जांच प्रक्रिया की वैधानिकता और न्यायालय में प्रभावी पैरवी बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में बार-बार विभागीय आदेशों पर स्थगन की स्थिति बनने पर विभाग की प्रक्रिया और कानूनी तैयारी की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
पहले भी हुई थी बड़ी कार्रवाई, फिर क्या हुआ?
छिंदवाड़ा जिला मुख्यालय में एक छात्रावास में एक बच्ची की मौत के मामले के बाद प्रशासनिक स्तर पर बड़ी कार्रवाई की गई थी। उस समय अधीक्षिका, सहायक अधीक्षिका सहित विभागीय अधिकारियों पर कार्रवाई और निलंबन की बात सामने आई थी।
लेकिन अब सवाल उठाया जा रहा है कि जिन मामलों में इतनी गंभीर कार्रवाई की गई थी, उनमें आगे की विभागीय प्रक्रिया आखिर कहां तक पहुंची? क्या कार्रवाई केवल तत्कालीन दबाव और घटना के बाद तक सीमित रह गई?
आलोचकों का कहना है कि यदि गंभीर घटनाओं के बाद जिम्मेदारी तय होने के बावजूद संबंधित लोगों की भूमिका या पदस्थापना को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तो विभागीय कार्रवाई की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या विभाग किसी दूसरी बड़ी घटना का इंतजार कर रहा है?
सिल्लेवानी बालक आश्रम शाला सहित अन्य संस्थाओं को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न बच्चों की सुरक्षा का है। छात्रावास और आश्रम शालाएं ऐसे स्थान हैं जहां बच्चों की सुरक्षा, भोजन, स्वास्थ्य और देखरेख की जिम्मेदारी सीधे प्रशासन और संबंधित विभाग की होती है।
ऐसे में यदि गंभीर घटनाओं के बाद भी व्यवस्थाओं की व्यापक समीक्षा नहीं होती और विवादों अथवा कार्रवाई का सामना कर रहे अधिकारियों के मामलों का समय पर निराकरण नहीं किया जाता, तो भविष्य में किसी नई घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
विभाग को देना होगा जवाब
जनजातीय कार्य विभाग छिंदवाड़ा को अब स्पष्ट करना चाहिए कि—
- कितने अधीक्षक वर्तमान में निलंबन अथवा विभागीय कार्रवाई के मामलों का सामना कर रहे हैं?
- इनमें से कितने लोगों को न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त है?
- विभाग ने ऐसे मामलों में न्यायालय के समक्ष क्या पक्ष रखा?
- सिल्लेवानी बालक आश्रम शाला में हुई घटना के बाद क्या स्थायी सुधारात्मक कदम उठाए गए?
- गंभीर घटनाओं के मामलों में विभागीय जांच और कार्रवाई की वर्तमान स्थिति क्या है?
- बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने क्या विशेष व्यवस्था की है?
जनजातीय कार्य विभाग का काम केवल आदेश जारी करना नहीं, बल्कि उन आदेशों को प्रभावी ढंग से लागू करना भी है। निलंबन, जांच और कार्रवाई के बाद यदि व्यवस्थाएं जस की तस बनी रहती हैं तो सवाल उठेंगे कि आखिर जिम्मेदारी तय कौन करेगा?
अब विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि वह गंभीर घटनाओं से सबक लेकर व्यवस्था सुधार रहा है या फिर किसी और बड़ी गलती और नई दुर्घटना का इंतजार कर रहा है।
नोट: खबर में उठाए गए आरोपों और विभागीय कार्रवाई की स्थिति पर जनजातीय कार्य विभाग एवं संबंधित अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा







