दस साल से बिना वैध गैस कनेक्शन के छात्रावास! सवालों के घेरे में भुगतान और व्यवस्था
भिमालगोंदी के सीनियर आदिवासी बालक छात्रावास का मामला; वर्तमान अधीक्षक ने सहायक आयुक्त को दिया लिखित आवेदन, वर्ष 2016 में ₹18,622 के भुगतान का भी उठ रहा सवाल
छिंदवाड़ा। जनजातीय कार्य विभाग के अधीन बिछुआ विकासखंड के सीनियर आदिवासी बालक छात्रावास भिमालगोंदी में गैस कनेक्शन और उससे जुड़े भुगतान को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वर्तमान अधीक्षक द्वारा सहायक आयुक्त को दिए गए लिखित आवेदन के बाद मामला सामने आया है कि छात्रावास के नाम पर गैस कनेक्शन से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, जबकि वर्ष 2016 में गैस एजेंसी के नाम ₹18,622 के भुगतान/चेक की बात सामने आ रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि छात्रावास के नाम पर वैध गैस कनेक्शन ही नहीं था, तो गैस सिलेंडर, भट्टी एवं अन्य सामग्री के नाम पर भुगतान किस आधार पर किया गया? इस भुगतान के बाद सामग्री की पूरी आपूर्ति हुई या नहीं, इसका रिकॉर्ड क्या है और विभागीय स्तर पर इसका सत्यापन किस अधिकारी ने किया—इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।
वर्तमान अधीक्षक ने उठाई सुरक्षा की चिंता
वर्तमान अधीक्षक भिमालगोंदी ने सहायक आयुक्त को दिए आवेदन में पूर्व व्यवस्था को लेकर अपनी चिंता जाहिर की है। उनके अनुसार, वर्ष 2016 में तत्कालीन अधीक्षक शांताराम ठाकरे द्वारा नाहर एचपी गैस एजेंसी के नाम ₹18,622 का चेक दिए जाने की जानकारी है। आवेदन के अनुसार, इस राशि में चार गैस सिलेंडर, भट्टी एवं अन्य सामग्री उपलब्ध कराया जाना बताया गया था। लेकिन वर्तमान अधीक्षक का कहना है कि उन्हें उपलब्ध कराई गई सामग्री में तीन सिलेंडर ही मिले हैं, जबकि एक सिलेंडर तथा गैस कनेक्शन से संबंधित दस्तावेजों की जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में छात्रावास संचालन के लिए गैस की व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने विभागीय अधिकारियों को अवगत कराया है।
दस साल से कनेक्शन नहीं तो भुगतान किस आधार पर?
मामले में सबसे गंभीर प्रश्न यही है कि यदि वर्ष 2016 से छात्रावास के नाम पर वैध गैस कनेक्शन उपलब्ध नहीं था, तो इसके बाद के वर्षों में गैस से संबंधित बिलों का भुगतान किस आधार पर हुआ? क्या प्रत्येक भुगतान से पहले गैस कनेक्शन, उपभोग और सामग्री की उपलब्धता का सत्यापन किया गया? यदि सत्यापन हुआ तो संबंधित दस्तावेज कहां हैं?
इन सवालों का जवाब विभागीय जांच, रिकॉर्ड की जांच और भौतिक सत्यापन से ही सामने आ सकता है।
निरीक्षण व्यवस्था पर भी सवाल
छात्रावासों के नियमित निरीक्षण की व्यवस्था होने के बावजूद यदि इतने वर्षों तक गैस कनेक्शन और उससे जुड़ी सामग्री के रिकॉर्ड की स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी, तो निरीक्षण करने वाले अधिकारियों और भुगतान स्वीकृत करने वाले अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, इस पूरे मामले में किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराना जांच से पहले उचित नहीं होगा। आवश्यक है कि जनजातीय कार्य विभाग वर्ष 2016 से अब तक के गैस कनेक्शन, भुगतान, बिल-वाउचर, स्टॉक रजिस्टर, गैस एजेंसी के रिकॉर्ड तथा छात्रावास में उपलब्ध सामग्री का स्वतंत्र भौतिक सत्यापन कराए।
₹18,622 का भुगतान बना जांच का मुख्य बिंदु
वर्ष 2016 में किए गए बताए जा रहे ₹18,622 के भुगतान की राशि किस मद से निकाली गई, किसके आदेश पर निकली, चेक किसके द्वारा जारी किया गया, एजेंसी ने वास्तव में क्या सामग्री दी और वर्तमान में उसका कितना हिस्सा छात्रावास में मौजूद है, इसकी जांच जरूरी है।
यदि रिकॉर्ड और भौतिक स्थिति में अंतर मिलता है तो जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई भी जांच के निष्कर्षों के आधार पर की जानी चाहिए।
अब विभाग के सामने ये बड़े सवाल
- क्या भिमालगोंदी छात्रावास के नाम वर्ष 2016 में वास्तव में गैस कनेक्शन लिया गया था?
- ₹18,622 के भुगतान के बदले एजेंसी ने कौन-कौन सी सामग्री उपलब्ध कराई?
- चार सिलेंडरों में से वर्तमान में केवल तीन होने की स्थिति का रिकॉर्ड क्या है?
- गैस कनेक्शन से संबंधित दस्तावेज छात्रावास या विभाग के रिकॉर्ड में क्यों नहीं हैं?
- वर्ष 2016 से अब तक गैस के नाम पर किए गए भुगतानों का सत्यापन किसने किया?
- क्या विभाग ने कभी गैस कनेक्शन और सामग्री का भौतिक सत्यापन किया?
अब निगाह विभागीय जांच पर है। यदि रिकॉर्ड की जांच और भौतिक सत्यापन निष्पक्ष तरीके से कराया जाता है तो वर्ष 2016 से चली आ रही गैस व्यवस्था और भुगतान की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है। फिलहाल वर्तमान अधीक्षक के लिखित आवेदन ने विभागीय व्यवस्था और पुराने भुगतान की निगरानी पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।






