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कच्चे मकान में चल रही प्राथमिक शाला… पातालकोट में विकास के दावों की खुली पोल!

च्चे मकान में चल रही प्राथमिक शाला… पातालकोट में विकास के दावों की खुली पोल!
पर्यटन और विकास पर बड़े-बड़े दावे, लेकिन आदिवासी बच्चों को नसीब नहीं अपना स्कूल भवन
तलाबढाना में वर्षों से असुविधाओं के बीच पढ़ रहे मासूम बच्चे, जिम्मेदार विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
छिंदवाड़ा। मध्यप्रदेश सरकार पातालकोट के विकास, आदिवासी क्षेत्रों के उत्थान और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लगातार दावे करती रही है। पर्यटन विकास के लिए योजनाएं बनाई जा रही हैं, करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की बातें हो रही हैं और पातालकोट को देश-दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने की कोशिशें जारी
हैं। लेकिन इन्हीं चमकदार दावों के बीच पातालकोट के एक गांव की तस्वीर सरकारी व्यवस्थाओं की जमीनी हकीकत पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।


पातालकोट क्षेत्र के ग्राम तलाबढाना में संचालित शासकीय एकीकृत शाला चिमटीपुर की प्राथमिक शाला आज भी अपने स्थायी भवन का इंतजार कर रही है। स्थिति यह है कि मासूम बच्चों को पढ़ाई के लिए पक्के और सुरक्षित स्कूल भवन की सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी है और उन्हें कच्चे मकान एवं असुविधाजनक परिस्थितियों में शिक्षा ग्रहण करनी पड़ रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस पातालकोट को विकास और पर्यटन के मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वहां आदिवासी बच्चों के लिए एक सुरक्षित स्कूल भवन की व्यवस्था आखिर अब तक क्यों नहीं हो सकी?
शिक्षक बदलते रहे, लेकिन नहीं बदली स्कूल की बदहाल तस्वीर
ग्रामीणों के अनुसार प्राथमिक शाला के भवन की समस्या कोई नई नहीं है। वर्षों से बच्चे इसी तरह अस्थायी और असुविधाजनक व्यवस्था में पढ़ाई कर रहे हैं। समय के साथ शिक्षक बदलते रहे, जिम्मेदार अधिकारी भी आते-जाते रहे, लेकिन स्कूल की तस्वीर बदलने के लिए कोई स्थायी समाधान सामने नहीं आया।
ग्रामीणों का कहना है कि इस समस्या की जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों तक कई बार पहुंचाई गई। इसके बावजूद अब तक स्थायी स्कूल भवन निर्माण को लेकर ठोस पहल दिखाई नहीं दे रही है।


सवाल यह है कि आखिर विभाग की प्राथमिकताओं में आदिवासी बच्चों की शिक्षा का स्थान कहां है?
क्या बच्चों की संख्या कम होने को आधार बनाकर उन्हें सुरक्षित भवन और मूलभूत शैक्षणिक सुविधाओं से वंचित रखा जा सकता है?
पर्यटन के लिए करोड़ों, लेकिन बच्चों के स्कूल के लिए भवन नहीं!
पातालकोट अपनी प्राकृतिक सुंदरता, गहरी घाटियों, घने जंगलों और आदिवासी संस्कृति के कारण देश-विदेश में प्रसिद्ध है। यहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए शासन और प्रशासन लगातार योजनाएं संचालित करने का दावा करते हैं। सड़क, पर्यटन सुविधाओं और विकास कार्यों पर बड़े स्तर पर खर्च की बात सामने आती रही है।
लेकिन इसी पातालकोट के तलाबढाना गांव के बच्चों के लिए एक पक्का स्कूल भवन उपलब्ध नहीं होना विकास की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
ग्रामीण पूछ रहे हैं कि—
जब पर्यटन विकास के लिए योजनाएं और बजट उपलब्ध हो सकते हैं, तो आदिवासी बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए एक स्कूल भवन की व्यवस्था क्यों नहीं हो पा रही?
क्या पातालकोट का विकास केवल पर्यटकों को दिखाई देने वाली तस्वीर तक सीमित है?
क्या जंगल और पहाड़ों के बीच रहने वाले आदिवासी बच्चों की शिक्षा सरकारी योजनाओं की प्राथमिकता में पीछे छूट गई है?
बारिश में बढ़ जाती है परेशानी, मासूम बच्चों की सुरक्षा भी सवालों के घेरे में
कच्चे और अस्थायी भवन में स्कूल संचालन की स्थिति बारिश के मौसम में और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है। बच्चों और शिक्षकों को असुविधाओं के बीच पढ़ाई और शिक्षण कार्य करना पड़ता है।
एक ओर सरकार प्रदेश में बेहतर शिक्षा व्यवस्था और सरकारी स्कूलों के सुदृढ़ीकरण की बात करती है, वहीं दूसरी ओर पातालकोट जैसे विशेष और आदिवासी क्षेत्र में प्राथमिक स्तर के बच्चों को आज तक सुरक्षित एवं स्थायी स्कूल भवन उपलब्ध नहीं कराया जा सका।
यह स्थिति केवल एक भवन की कमी नहीं, बल्कि दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों तक मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के सरकारी दावों की वास्तविक परीक्षा भी है।


पीएम जनमन सहित कई योजनाएं, फिर भी बच्चों की यह हालत क्यों?
केंद्र और मध्यप्रदेश सरकार द्वारा विशेष रूप से पिछड़े और आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। प्रधानमंत्री जनमन योजना सहित विभिन्न योजनाओं के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों तक सड़क, आवास, शिक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के दावे किए जा रहे हैं।
इसके लिए बड़े पैमाने पर बजट और योजनाओं की घोषणाएं भी होती हैं।
लेकिन तलाबढाना की यह तस्वीर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि आखिर योजनाओं और बजट के दावों के बावजूद एक प्राथमिक शाला को अपना पक्का भवन क्यों नहीं मिल पाया?
क्या योजनाओं की सफलता केवल कागजों और आंकड़ों तक सीमित है, या वास्तव में अंतिम छोर पर रहने वाले आदिवासी परिवारों और उनके बच्चों तक सुविधाएं पहुंच रही हैं?
जंगलों के बीच बच्चे कर रहे बेहतर भविष्य की लड़ाई
पातालकोट के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ी इलाके में बसे गांवों तक पहुंचना आज भी चुनौतीपूर्ण है। इसके बावजूद यहां के बच्चे शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल पहुंचते हैं।
इन बच्चों के लिए स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि गरीबी, पिछड़ेपन और सीमित संसाधनों से बाहर निकलकर बेहतर भविष्य बनाने की उम्मीद है।
लेकिन विडंबना यह है कि जिन बच्चों को बेहतर सुविधाएं देकर आगे बढ़ाने की जरूरत है, वे आज भी अपने स्कूल के लिए एक सुरक्षित और पक्के भवन का इंतजार कर रहे हैं।
पातालकोट के जंगलों के बीच बसे तलाबढाना की यह तस्वीर विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद अंतर को साफ तौर पर सामने लाती है।
बड़ा सवाल—आखिर कब मिलेगा मासूमों को अपना स्कूल?
अब सवाल केवल एक गांव या एक स्कूल का नहीं है।
सवाल यह है कि—

● आखिर वर्षों से स्कूल भवन की समस्या का समाधान क्यों नहीं हुआ?
● जिम्मेदार शिक्षा विभाग ने अब तक स्थायी व्यवस्था के लिए क्या कदम उठाए?
● आदिवासी क्षेत्र में बच्चों की मूलभूत शिक्षा सुविधाओं को प्राथमिकता क्यों नहीं मिली?
● क्या जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करेंगे?
और सबसे बड़ा सवाल—आखिर तलाबढाना के मासूम बच्चों को अपना सुरक्षित और पक्का स्कूल भवन कब मिलेगा?
ग्रामीणों ने मध्यप्रदेश सरकार और संबंधित विभाग से मांग की है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल स्थल निरीक्षण कराया जाए और प्राथमिक शाला के लिए सुरक्षित एवं स्थायी भवन निर्माण की कार्रवाई शुरू की जाए।
अब देखना यह होगा कि पातालकोट के विकास के बड़े दावों के बीच तलाबढाना के बच्चों की यह आवाज जिम्मेदार अधिकारियों और मध्यप्रदेश सरकार तक पहुंचती है या फिर मासूम बच्चे वर्षों की तरह आगे भी कच्चे मकान और असुविधाओं के बीच पढ़ाई करने को मजबूर रहेंगे।