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छात्रावास में एक की जगह तीन अधीक्षक! आखिर क्यों अपने ही आदेश वापस लेने पड़े सहायक आयुक्त को?

पंचायत दिशा समाचार की खबर का असर—दो अधीक्षिकाओं को वापस मूल शाला भेजा, लेकिन जिला मुख्यालय की अन्य संस्थाओं में अब भी अधिशेष शिक्षकों का जमावड़ा!

छिंदवाड़ा। जनजातीय कार्य विभाग छिंदवाड़ा इन दिनों शिक्षक-शिक्षिकाओं की पदस्थापना और अटैचमेंट व्यवस्था को लेकर लगातार सवालों के घेरे में है। आदिवासी अंचलों की संस्थाओं से शिक्षक एवं शिक्षिकाओं को जिला मुख्यालय की संस्थाओं में अटैच किए जाने के मामलों को पंचायत दिशा समाचार द्वारा प्रमुखता से उठाए जाने के बाद विभागीय व्यवस्था में बदलाव देखने को मिला है।

आदिवासी पोस्ट मैट्रिक सीनियर कन्या छात्रावास में एक पद के स्थान पर तीन अधीक्षिकाओं को प्रभार/पदस्थापना दिए जाने के मामले में सवाल उठने के बाद सहायक आयुक्त सत्येंद्र सिंह मरकाम को अपने पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए दो अधीक्षिकाओं को उनकी मूल संस्था वापस भेजना पड़ा।

लेकिन बड़ा सवाल अभी भी कायम है कि यदि एक ही संस्था में आवश्यकता से अधिक कर्मचारियों की पदस्थापना उचित नहीं थी, तो फिर जिला मुख्यालय की अन्य संस्थाओं में वर्षों अथवा लंबे समय से चल रही अधिशेष व्यवस्था पर कार्रवाई कब होगी?


आदिवासी नवीन बालक आश्रम में भी जरूरत से ज्यादा शिक्षक!

जिला मुख्यालय के खजरी रोड स्थित आदिवासी नवीन बालक आश्रम में निर्धारित आवश्यकता के अनुसार एक अधीक्षक और दो शिक्षकों की व्यवस्था बताई जा रही है। इसके बावजूद यहां अतिरिक्त शिक्षक/शिक्षिकाओं को अटैचमेंट के माध्यम से पदस्थ किए जाने की जानकारी सामने आई है।

सूत्रों और उपलब्ध जानकारी के अनुसार संस्था में आवश्यकता से अधिक लगभग तीन शिक्षक/शिक्षिकाएं कार्यरत हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब आदिवासी अंचलों के विद्यालयों और छात्रावासों में शिक्षकों की आवश्यकता बनी रहती है, तब जिला मुख्यालय की संस्थाओं में अतिरिक्त पदस्थापना आखिर किस आधार पर की जा रही है?

क्या विभाग के पास वास्तविक आवश्यकता और स्वीकृत पदों का कोई स्पष्ट आंकलन है, या फिर अटैचमेंट व्यवस्था मनमाने ढंग से संचालित हो रही है?


खापाभाट स्थित आदिवासी बालक आश्रम में भी अधिशेष का मामला

जनजातीय कार्य विभाग द्वारा संचालित 120 सीटर आदिवासी बालक आश्रम शाला, खापाभाट में भी आवश्यकता से अधिक शिक्षक/शिक्षिकाओं के अटैचमेंट की बात सामने आई है।

जानकारी के अनुसार यहां चार से पांच शिक्षक/शिक्षिकाएं अधिशेष रूप से कार्यरत बताई जा रही हैं। यदि संस्था में वास्तव में स्वीकृत पदों और आवश्यकता से अधिक शिक्षक पदस्थ हैं, तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इन कर्मचारियों को उनकी मूल संस्थाओं में वापस क्यों नहीं भेजा जा रहा है।


एक मामले में कार्रवाई, बाकी मामलों में चुप्पी क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक छात्रावास में तीन अधीक्षिकाओं की व्यवस्था पर सवाल उठने के बाद आदेश वापस लिया जा सकता है, तो फिर अन्य संस्थाओं में अधिशेष रूप से पदस्थ शिक्षक/शिक्षिकाओं की व्यवस्था पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

क्या नियम सभी संस्थाओं के लिए अलग-अलग हैं?
क्या जिला मुख्यालय में अटैचमेंट के लिए कोई विशेष व्यवस्था बनाई गई है?
और आदिवासी अंचलों की मूल संस्थाओं में पढ़ाई प्रभावित होने की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?

पंचायत दिशा समाचार का सवाल है कि विभाग को सभी छात्रावासों और आश्रम शालाओं की स्वीकृत पद संख्या, वास्तविक आवश्यकता और वर्तमान पदस्थ कर्मचारियों की सूची सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

यदि जिला मुख्यालय की संस्थाओं में शिक्षक/शिक्षिकाएं वास्तव में अधिशेष पाए जाते हैं, तो उन्हें उनकी मूल शालाओं में वापस भेजकर वहां विद्यार्थियों की पढ़ाई व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए।

अब देखना यह होगा कि सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग केवल एक मामले में आदेश वापस लेने तक सीमित रहते हैं या फिर जिला मुख्यालय की सभी संस्थाओं की समीक्षा कर अधिशेष शिक्षक/शिक्षिकाओं को उनकी मूल पदस्थापना पर वापस भेजने की कार्रवाई भी करते हैं।

पंचायत दिशा समाचार इस पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है।

नोट : समाचार में लगाए गए आरोपों एवं अधिशेष पदस्थापना संबंधी तथ्यों पर जनजातीय कार्य विभाग और सहायक आयुक्त का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।