बिछुआ बना सागौन तस्करी का गढ़!
जंगलों की कटाई पर वन विभाग बेबस या मिलीभगत? रात के अंधेरे में दौड़ रहे तस्करों के वाहन, गश्त में पकड़े 19 सागौन लट्ठे
करोड़ों खर्च के बावजूद जंगल सुरक्षित नहीं, छोटी-छोटी कार्रवाई कर पीठ थपथपा रहा विभाग
रिपोर्ट -ठा.रामकुमार राजपूत
छिंदवाड़ा/बिछुआ। बिछुआ क्षेत्र के जंगलों में सागौन की अवैध कटाई और तस्करी का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। वन क्षेत्र से सागौन की लकड़ी और रेत की तस्करी को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। हालात यह हैं कि रात के अंधेरे में वन संपदा को ठिकाने लगाने वाले तस्कर सक्रिय हैं और वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय स्तर पर वन विभाग के कुछ अधिकारी-कर्मचारियों की कथित सांठगांठ के आरोप भी लग रहे हैं, हालांकि इसकी स्वतंत्र जांच होना जरूरी है।
मुखबिर की सूचना पर जागा वन विभाग, दो वाहनों में मिली अवैध गतिविधि
23 अगस्त की दरमियानी रात मुखबिर से सूचना मिलने के बाद वन विभाग ने दो गश्ती दल गठित किए। एक दल चारगांव-बोरडी मार्ग और दूसरा मोया-चारगांव मार्ग पर गश्त कर रहा था। इसी दौरान चारगांव बीट के कक्ष क्रमांक 1498, जोपपार नाला क्षेत्र में एक पिकअप वाहन दिखाई दिया। वनकर्मियों ने घेराबंदी कर वाहन को रोकने का प्रयास किया, लेकिन वाहन में सवार लोग अंधेरे का फायदा उठाकर भाग गए।
तलाशी के दौरान पिकअप क्रमांक MP28-ZE-6276 से 19 नग सागौन के लट्ठे, करीब 2 घन मीटर बरामद किए गए। वाहन को जब्त कर लिया गया।
बोलेरो में मिले लकड़ी काटने के हाथ आरे
इसी दौरान दूसरे गश्ती दल ने चारगांव-मोया मार्ग पर बोलेरो क्रमांक MP28-TA-0864 को घेराबंदी कर रोका। वाहन में सवार दो लोग भाग निकले, जबकि वनकर्मियों ने गौरव रघुवंशी निवासी गुमतरा को पकड़ लिया। तलाशी में वाहन से लकड़ी काटने के दो हाथ आरे बरामद किए गए।
वन विभाग के अनुसार पूछताछ में गौरव ने कुछ अन्य लोगों के नाम बताए हैं। विभाग ने स्वपनिल रघुवंशी और राहुल रघुवंशी निवासी गुमतरा को फरार बताया है और उनकी तलाश की जा रही है।
एक कार्रवाई ने खोली जंगल की सुरक्षा व्यवस्था की पोल..
वन विभाग ने दोनों वाहनों और सागौन के लट्ठों को जब्त कर पीओआर क्रमांक 46076/22 दिनांक 23 अगस्त 2026 के तहत प्रकरण दर्ज किया है। भारतीय वन अधिनियम, 1927 की संबंधित धाराओं में कार्रवाई की गई है। कार्रवाई में वनपरिक्षेत्र कुंभपानी और खमारपानी के कर्मचारी तथा सुरक्षा श्रमिक शामिल रहे।
लेकिन सवाल यह है कि यदि जंगल में नियमित गश्त और निगरानी हो रही है तो सागौन के पेड़ों की कटाई कर लकड़ी को जंगल से बाहर ले जाने वाले तस्कर लगातार सक्रिय कैसे हैं? क्या वन विभाग को केवल मुखबिर की सूचना मिलने के बाद ही तस्करी का पता चलता है? जंगलों की सुरक्षा के नाम पर खर्च होने वाली राशि और जमीनी निगरानी व्यवस्था की भी जांच की जरूरत है।
सिर्फ 19 लट्ठे जब्त करने से नहीं बचेगा जंगल
बिछुआ क्षेत्र में यह कार्रवाई निश्चित तौर पर वन विभाग की एक सफलता है, लेकिन सवाल कार्रवाई से ज्यादा उस व्यवस्था पर है जो लगातार जंगलों को अवैध कटाई से नहीं बचा पा रही। यदि एक रात में दो संदिग्ध वाहन जंगल क्षेत्र में सक्रिय पाए जा सकते हैं तो लंबे समय से चल रही अवैध कटाई और तस्करी के नेटवर्क का दायरा कितना बड़ा है, यह जांच का विषय है।
वन विभाग को केवल वाहनों और लकड़ी की जब्ती तक सीमित रहने के बजाय सागौन कटाई के पूरे नेटवर्क, लकड़ी के अंतिम खरीदार, परिवहन मार्ग और कथित संरक्षण देने वालों तक पहुंचना होगा। साथ ही वन क्षेत्र में तैनात कर्मचारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जंगलों की कटाई केवल तस्करों की करतूत है या कहीं विभागीय स्तर पर लापरवाही अथवा मिलीभगत भी तो नहीं।








