बिसनपुर में पांच कक्षाओं पर एक शिक्षक, शिक्षिका के अटैचमेंट पर उठे सवाल
धनेगांव प्राचार्य ने सहायक आयुक्त को लिखा अंतिम भुगतान का पत्र, अब जिला मुख्यालय से वेतन निकालने की बात; सितंबर 2022 से सौसर छात्रावास में अटैचमेंट पर हैं शिक्षिका प्रीति राऊत
छिंदवाड़ा। आदिवासी अंचलों के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। बिसनपुर शासकीय प्राथमिक शाला में पदस्थ शिक्षिका प्रीति राऊत के लंबे समय से मूलशाला से बाहर अटैचमेंट पर रहने का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि शिक्षिका सितंबर 2022 से उत्कृष्ट कन्या छात्रावास, सौसर में अटैचमेंट पर पदस्थ हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब ग्रामीण क्षेत्र के स्कूल में शिक्षकों की आवश्यकता है, तो आखिर शिक्षिका की मूलशाला में वापसी अब तक क्यों नहीं हुई?

एक शिक्षक के भरोसे पांच कक्षाएं!
बिसनपुर प्राथमिक शाला में वर्तमान में एक शिक्षक के भरोसे पांच कक्षाओं के संचालन की स्थिति बताई जा रही है। ऐसे में कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों को एक ही शिक्षक द्वारा पढ़ाना कितना प्रभावी हो पा रहा होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक शिक्षक एक साथ पांच कक्षाओं के बच्चों की पढ़ाई, उपस्थिति, पाठ्यक्रम और शैक्षणिक गतिविधियों को किस तरह संभाल पा रहा होगा? यदि स्थिति वास्तव में ऐसी है, तो इसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ना स्वाभाविक है।

धनेगांव प्राचार्य का पत्र बना चर्चा का विषय
मामले में अब नया मोड़ तब आया जब धनेगांव संकुल केंद्र के प्राचार्य द्वारा सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य विभाग को शिक्षिका प्रीति राऊत के अंतिम भुगतान को लेकर पत्र लिखे जाने की जानकारी सामने आई है। पत्र में अब वेतन का भुगतान जिला मुख्यालय से किए जाने की बात सामने आने के बाद विभागीय व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं।

सवाल यह है कि यदि शिक्षिका लंबे समय से छात्रावास में अटैचमेंट पर हैं, तो मूलशाला बिसनपुर में उनकी सेवाओं की आवश्यकता और वहां बच्चों की शैक्षणिक स्थिति का विभाग ने अब तक संज्ञान क्यों नहीं लिया?
शिकायत और खबर के बाद सक्रिय हुआ विभाग?
इस पूरे मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या शिकायतों और सोशल मीडिया पर मामला सामने आने के बाद ही धनेगांव प्राचार्य द्वारा सहायक आयुक्त को पत्र लिखा गया? यदि ऐसा है तो फिर विभागीय स्तर पर पहले से निगरानी क्यों नहीं की गई?
ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षकों की कमी कोई छोटी समस्या नहीं है। ऐसे में वर्षों तक किसी शिक्षक या शिक्षिका को मूल पदस्थापना से अलग स्थान पर अटैच रखने की व्यवस्था पर पारदर्शिता से सवाल उठना स्वाभाविक है।
अटैचमेंट की व्यवस्था पर भी उठे सवाल.!
जनजातीय कार्य विभाग में लंबे समय से चल रहे अटैचमेंट को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगते रहे हैं कि ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में पदस्थ कर्मचारियों को विभिन्न कारणों से शहरी अथवा सुविधाजनक स्थानों पर अटैच कर दिया जाता है।
यदि किसी शिक्षक को आदिवासी क्षेत्र के बच्चों को पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया है, तो उसकी मूल पदस्थापना वाले स्कूल से लंबे समय तक बाहर रखना और उसी स्कूल को शिक्षकों की कमी से जूझने देना गंभीर प्रशासनिक प्रश्न खड़े करता है।
बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी किसकी?
बिसनपुर के बच्चों के अभिभावकों और ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब स्कूल में पांच कक्षाओं के लिए पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, तो विभाग बच्चों की पढ़ाई की भरपाई कैसे करेगा?
क्या विभाग शिक्षिका प्रीति राऊत का अटैचमेंट समाप्त कर उन्हें तत्काल मूलशाला बिसनपुर वापस भेजेगा? क्या बिसनपुर स्कूल में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराए जाएंगे? और क्या वर्षों से चल रहे अटैचमेंट की व्यवस्था की जिला स्तर पर समीक्षा होगी?
अटैचमेंट के आदेश और उसकी अवधि को लेकर विभागीय स्तर पर निर्णय होते हैं। ऐसे में सवाल सीधे जनजातीय कार्य विभाग के अधिकारियों से भी है कि आखिर किसी शिक्षक को वर्षों तक मूलशाला से अलग रखने की आवश्यकता क्या थी?
यदि अटैचमेंट किसी प्रशासनिक आवश्यकता के कारण किया गया था तो उसकी समय-समय पर समीक्षा क्यों नहीं हुई? और यदि अब मूलशाला में शिक्षक की कमी है तो अटैचमेंट समाप्त कर शिक्षक को वापस भेजने में देरी क्यों?
आदिवासी बच्चों की शिक्षा से समझौता कब तक?
आदिवासी अंचल के बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए शासन करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है। दूसरी ओर यदि किसी प्राथमिक स्कूल में एक शिक्षक को पांच कक्षाएं संभालनी पड़ रही हैं, तो यह स्थिति विभागीय दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को सामने लाती है।
अब देखना यह है कि सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं। क्या शिक्षिका का वर्षों पुराना अटैचमेंट समाप्त कर उन्हें बिसनपुर की मूलशाला में वापस भेजा जाएगा या फिर अटैचमेंट का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब आदिवासी बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नियुक्त किए गए हैं, तो आखिर उन्हें वर्षों तक मूलशाला से दूर रखने की जिम्मेदारी किसकी है? और बिसनपुर के बच्चों की शिक्षा प्रभावित होने की स्थिति में जवाबदेही किसकी तय होगी?
नोट: प्राथमिक शिक्षिका प्रीति राऊत एवं सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समाचार में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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