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भारिया जाति की महिलाओं को लाभ देने आई योजना बनी ‘छलावा’!लाड़ली बहना से हटाया, भारिया महिला मुखिया अनुदान का पैसा भी अटका;

भारिया जाति की महिलाओं को लाभ देने आई योजना बनी ‘छलावा’!

लाड़ली बहना से हटाया, भारिया महिला मुखिया अनुदान का पैसा भी अटका;

पातालकोट की 3176 महिलाओं के सामने आर्थिक संकट

छिंदवाड़ा/तामिया। भारिया जनजाति की महिलाओं को आर्थिक सहायता देने और कुपोषण से मुक्ति की दिशा में मदद पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू की गई भारिया महिला मुखिया अनुदान योजना को लेकर अब जमीनी स्तर पर सवाल उठने लगे हैं। महिलाओं का कहना है कि योजना का लाभ मिलने के बजाय उन्हें पहले से मिल रही लाड़ली बहना योजना की राशि से भी वंचित होना पड़ रहा है।


बताया जा रहा है कि शासन की पात्रता व्यवस्था के तहत यदि किसी महिला को लाड़ली बहना योजना का लाभ मिल रहा है तो उसे भारिया महिला मुखिया अनुदान योजना का लाभ नहीं दिया जाता। वहीं भारिया महिला मुखिया अनुदान योजना में शामिल होने वाली महिलाओं को लाड़ली बहना योजना से बाहर कर दिया जाता है। दोनों योजनाओं में ₹1500 प्रतिमाह की सहायता का प्रावधान होने के कारण महिलाओं के बीच यह सवाल उठ रहा है कि अलग उद्देश्य वाली योजनाओं में उन्हें वास्तविक अतिरिक्त सहायता आखिर कितनी मिल रही है।


लाड़ली बहना का पैसा समय पर मिला, नई योजना में भुगतान अटका
भारिया समाज की महिलाओं की सबसे बड़ी परेशानी भुगतान को लेकर सामने आ रही है। उनका कहना है कि जब तक उन्हें लाड़ली बहना योजना का लाभ मिल रहा था, तब तक राशि नियमित रूप से खाते में पहुंच रही थी। लेकिन भारिया महिला मुखिया अनुदान योजना में शामिल किए जाने के बाद उन्हें कई महीनों से राशि नहीं मिली है।
पातालकोट क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारिया परिवार निवास करते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यहां करीब 3176 महिलाएं भारिया महिला मुखिया अनुदान योजना के अंतर्गत पंजीकृत बताई जा रही हैं। महिलाओं का दावा है कि इनमें से कई हितग्राहियों को पांच से छह माह से अनुदान की राशि प्राप्त नहीं हुई है।


एक योजना का लाभ मिला, दूसरी का छूटा—फिर भी नई योजना की राशि का इंतजार
महिलाओं का कहना है कि उन्हें उम्मीद थी कि भारिया जनजाति के लिए विशेष रूप से शुरू की गई योजना से उन्हें आर्थिक राहत मिलेगी। लेकिन यदि लाड़ली बहना योजना से हटाकर नई योजना में शामिल किया गया और नई योजना की राशि भी समय पर नहीं मिली, तो उनके लिए यह व्यवस्था लाभ के बजाय परेशानी बन गई है।
यहीं से योजना के क्रियान्वयन पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। लाड़ली बहना योजना का उद्देश्य महिलाओं की आर्थिक-सामाजिक स्थिति को मजबूत करना है, जबकि भारिया महिला मुखिया अनुदान योजना का उद्देश्य भारिया जनजाति की महिलाओं को विशेष सहायता उपलब्ध कराना और कुपोषण जैसी समस्या से निपटने में मदद करना बताया जाता है। ऐसे में दोनों योजनाओं को एक-दूसरे के विकल्प के रूप में लागू करने पर हितग्राहियों को वास्तविक अतिरिक्त लाभ कितना मिल रहा है, यह जांच का विषय बन गया है।


सरकार से उठ रहे सवाल
यदि भारिया महिलाओं को विशेष परिस्थितियों और विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अलग योजना शुरू की गई है, तो फिर उन्हें दूसरी महिला कल्याण योजना से बाहर करने का क्या औचित्य है? और यदि उन्हें लाड़ली बहना से हटाकर भारिया महिला मुखिया अनुदान योजना में शामिल किया गया है, तो नई योजना की राशि समय पर क्यों नहीं पहुंच रही?


सबसे बड़ा सवाल यह है कि पातालकोट की 3176 महिलाओं के भुगतान में देरी का कारण क्या है और उन्हें लंबित राशि कब तक मिलेगी?
महिलाओं का कहना है कि योजना कागजों पर राहत देने वाली दिखाई देती है, लेकिन यदि भुगतान ही समय पर नहीं हो रहा है तो योजना का उद्देश्य धरातल पर कैसे पूरा होगा।
जांच और स्पष्टता की जरूरत
अब जरूरत है कि संबंधित विभाग स्पष्ट करे कि पातालकोट क्षेत्र में योजना के तहत कितनी महिलाएं पात्र हैं, कितनी महिलाओं को लाड़ली बहना योजना से हटाकर इस योजना में शामिल किया गया, कितने महीनों की राशि लंबित है और भुगतान में देरी का वास्तविक कारण क्या है।
भारिया जनजाति के उत्थान और कुपोषण से लड़ने के उद्देश्य से शुरू हुई योजना यदि हितग्राहियों को समय पर आर्थिक सहायता ही नहीं दे पा रही है, तो फिर योजना के क्रियान्वयन और बजट व्यवस्था की समीक्षा जरूरी हो जाती है।