चपरासी कर रहे बाबूगिरी, नियमों को ताक पर रखकर वर्षों से अटैचमेंट का खेल!
जिला मुख्यालय से लेकर स्कूलों तक भृत्यों से कराया जा रहा लिपिकीय काम, जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
विशेष रिपोर्ट -रामकुमार राजपूत
छिंदवाड़ा। जनजातीय कार्य विभाग में कर्मचारियों की पदस्थापना और अटैचमेंट व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि विभाग के जिला मुख्यालय कार्यालय सहित जिले के कई शैक्षणिक संस्थानों में भृत्य (चपरासी) के पद पर नियुक्त कर्मचारियों से लिपिकीय यानी बाबूगिरी का काम कराया जा रहा है। इससे न केवल विभागीय व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि कर्मचारियों की मूल पदस्थापना और कार्य विभाजन को लेकर भी गंभीर स्थिति सामने आ रही है।
मामला बिछुआ विकासखंड के संकुल केंद्र धनेगांव अंतर्गत शासकीय माध्यमिक विद्यालय मुंगनापार से जुड़ा बताया जा रहा है। यहां भृत्य के पद पर पदस्थ ज्ञानचंद बुनकर लंबे समय से अपनी मूलशाला में सेवाएं देने के बजाय शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय धनेगांव में लिपिकीय कार्य कर रहे हैं। आरोप है कि वर्ष 2006 से वे लगातार इसी व्यवस्था के तहत बाबूगिरी का कार्य कर रहे हैं।
मूल पद भृत्य, काम बाबू का!
सवाल यह है कि जब ज्ञानचंद बुनकर की मूल पदस्थापना शासकीय माध्यमिक विद्यालय मुंगनापार में भृत्य के पद पर है, तो उन्हें इतने लंबे समय से दूसरी संस्था में लिपिकीय कार्य के लिए क्यों रखा गया है? यदि विभाग में लिपिकीय कार्य के लिए कर्मचारियों की आवश्यकता है तो क्या इसके लिए विभागीय नियमों के अनुसार नियमित रूप से पदस्थ लिपिक उपलब्ध नहीं हैं?

वहीं, विभाग के जिला मुख्यालय कार्यालय में भी बड़ी संख्या में भृत्यों के लिपिकीय कार्य करने की चर्चा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब कार्यालय में नियमित कर्मचारी मौजूद हैं तो भृत्यों से बाबू का काम कराने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
वर्षों से चल रही व्यवस्था पर विभाग मौन
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ज्ञानचंद बुनकर वर्ष 2006 से धनेगांव में लिपिकीय कार्य कर रहे हैं, तो इतने वर्षों में विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने उनकी मूल पदस्थापना पर भेजने की कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या इतने लंबे समय तक चली यह व्यवस्था विभागीय अधिकारियों की जानकारी में नहीं थी?
आरोप है कि अटैचमेंट की इस व्यवस्था को समाप्त करने के बजाय जिम्मेदार अधिकारी इसे लगातार संरक्षण दे रहे हैं। यदि यह आरोप सही है तो पूरे जिले में ऐसे मामलों की जांच कराकर यह पता लगाना जरूरी है कि कितने भृत्य अपनी मूल पदस्थापना छोड़कर वर्षों से कार्यालयों और स्कूलों में लिपिकीय कार्य कर रहे हैं।
कुर्सियां खाली, फिर भी चपरासियों से काम!
विभागीय व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए यह भी पूछा जा रहा है कि जिला मुख्यालय सहित अन्य कार्यालयों में यदि लिपिकीय कार्य का इतना दबाव है, तो विभाग में पदस्थ नियमित कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की जा रही? क्या भृत्यों से बाबू का काम कराकर विभाग नियमों और पद संरचना की अनदेखी नहीं कर रहा है?
मामले में विभाग को तत्काल जिलेभर में किए गए ऐसे सभी अटैचमेंट की समीक्षा कर भृत्य कर्मचारियों को उनकी मूल पदस्थापना पर भेजने की कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही वर्ष 2006 से धनेगांव में लिपिकीय कार्य कर रहे ज्ञानचंद बुनकर की पदस्थापना और कार्यादेश की जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए।
अब देखना यह है कि सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग इस मामले में जांच कराते हैं या वर्षों से चली आ रही अटैचमेंट व्यवस्था इसी तरह जारी रहती है।








