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बिना गैस कनेक्शन वर्षों से छात्रावास संचालन! सुरक्षा से खिलवाड़ पर उठे गंभीर सवाल

बिना गैस कनेक्शन वर्षों से छात्रावास संचालन! सुरक्षा से खिलवाड़ पर उठे गंभीर सवाल

रिपोर्ट- रामकुमार ठाकुर

छिंदवाड़ा। आदिवासी सीनियर बालक छात्रावास भिंमालगोदी में गैस कनेक्शन को लेकर सामने आई शिकायत ने जनजातीय कार्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि छात्रावास में वर्ष 2016 से वैध गैस कनेक्शन के बिना ही भोजन व्यवस्था संचालित होती रही। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब छात्रावास में गैस कनेक्शन ही नहीं था, तो इतने वर्षों तक गैस सिलेंडर और गैस खर्च के भुगतान से जुड़े बिल आखिर किस आधार पर स्वीकृत होते रहे?
वर्तमान अधीक्षक ने सहायक आयुक्त को दी लिखित शिकायत
मामले में छात्रावास के वर्तमान अधीक्षक द्वारा सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य विभाग को लिखित शिकायत दिए जाने की बात सामने आई है। शिकायत के बाद अब विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। यदि वर्षों से छात्रावास में वैध गैस कनेक्शन नहीं था, तो विभागीय अधिकारियों और संबंधित शाखा के कर्मचारियों ने इसकी जांच क्यों नहीं की?
वर्ष 2016 में ₹18,622 के चेक का रहस्य
मामले का सबसे अहम बिंदु वर्ष 2016 से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि तत्कालीन अधीक्षक शांताराम ठाकरे द्वारा गैस कनेक्शन के लिए ₹18,622 का चेक किसी गैस एजेंसी को दिया गया था। लेकिन सवाल यह है कि भुगतान के बाद वास्तव में गैस कनेक्शन हुआ या नहीं? यदि कनेक्शन नहीं हुआ तो राशि का क्या हुआ और उसका हिसाब विभाग के पास क्या है?
यदि गैस कनेक्शन नहीं लिया गया था, तो इतने वर्षों तक छात्रावास में गैस सिलेंडर कहां से आते रहे? और यदि सिलेंडर खरीदे जा रहे थे, तो उनके भुगतान के लिए प्रस्तुत बिलों की विभाग ने कभी जांच क्यों नहीं की?
बाबुओं की भूमिका भी जांच के घेरे में
सिर्फ तत्कालीन अधीक्षक की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं होगा। यदि वर्षों तक गैस खर्च के बिल विभाग में प्रस्तुत होते रहे और उनका भुगतान भी होता रहा, तो बिलों की जांच करने वाले संबंधित लिपिक, लेखा शाखा और स्वीकृति देने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—बिना गैस कनेक्शन के गैस खर्च के बिल पास कैसे होते रहे?
कल कोई हादसा होता तो जिम्मेदार कौन?
छात्रावास में रहने वाले बच्चे विभाग की जिम्मेदारी हैं। ऐसे में सुरक्षा मानकों की अनदेखी को सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं माना जा सकता। यदि वास्तव में बिना वैध गैस कनेक्शन के वर्षों तक गैस व्यवस्था संचालित होती रही, तो यह छात्रावास में रहने वाले बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है।
अब विभाग को वर्ष 2016 से आज तक के गैस कनेक्शन संबंधी दस्तावेज, एजेंसी को किए गए भुगतान, गैस सिलेंडर खरीद के बिल, कैशबुक, वाउचर और संबंधित अभिलेखों की जांच कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
जांच हुई तो खुल सकता है वर्षों पुराना हिसाब
मामले में निष्पक्ष जांच के साथ छात्रावास का भौतिक सत्यापन कराया जाना जरूरी है। वर्ष 2016 में दिए गए ₹18,622 के चेक से लेकर वर्तमान समय तक गैस सिलेंडर की खरीद और भुगतान का पूरा रिकॉर्ड सामने आने पर ही स्पष्ट होगा कि लापरवाही कहां हुई और जिम्मेदार कौन है।
अब देखना यह है कि जनजातीय कार्य विभाग इस गंभीर शिकायत पर केवल कागजी खानापूर्ति करता है या फिर वर्षों पुराने गैस कनेक्शन और भुगतान के पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई करता है।

आदिवासी समाज की पुकार साहब कब तक यूं ही हमारे बच्चों के नाम पर अधीक्षक करते रहेंगे गोलमाल..?