एक शिक्षक के भरोसे पांच कक्षाएं, बिसनपुर के आदिवासी बच्चों का भविष्य संकट में
2022 से सौसर छात्रावास में अधीक्षिका का दायित्व, मूलशाला में शिक्षिका की कमी—सहायक आयुक्त के आदेश पर उठे गंभीर सवाल..!
छिंदवाड़ा। विशेष रिपोर्ट(रामकुमार ठाकुर)
आदिवासी अंचलों में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के तमाम दावों के बीच बिछुआ विकासखंड के शासकीय प्राथमिक शाला बिसनपुर की तस्वीर विभागीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। पहली से पांचवीं तक संचालित इस स्कूल में पांच कक्षाओं की जिम्मेदारी महज एक शिक्षक के भरोसे है। ग्रामीणों का आरोप है कि स्कूल में पदस्थ शिक्षिका प्रीति राऊत को वर्ष 2022 में सौसर स्थित वीरांगना रानी दुर्गावती उत्कृष्ट कन्या छात्रावास में अधीक्षिका का दायित्व सौंप दिया गया, जिसके बाद मूलशाला में शिक्षकों की कमी बनी हुई है।
आखिर एक शिक्षिका को मूलशाला से हटाने की जरूरत क्यों पड़ी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब बिसनपुर जैसे प्राथमिक स्कूल में पहले से शिक्षकों की कमी थी, तो शिक्षिका को छात्रावास के अतिरिक्त दायित्व के लिए हटाने का निर्णय किस आधार पर लिया गया? यदि छात्रावास में अधीक्षिका की आवश्यकता थी, तो क्या विभाग के पास किसी अन्य शिक्षक की व्यवस्था नहीं थी? और यदि शिक्षिका को मूलशाला से हटाया गया, तो उनकी जगह वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
ग्रामीणों का कहना है कि विभागीय आदेश की कीमत अब छोटे-छोटे आदिवासी बच्चों को अपनी पढ़ाई से चुकानी पड़ रही है।

पांच कक्षाएं, एक शिक्षक… कैसे होगी गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई?
प्राथमिक स्कूल में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाने, उनका शैक्षणिक मूल्यांकन करने और नियमित शैक्षणिक गतिविधियां संचालित करने की जिम्मेदारी एक ही शिक्षक पर होने से व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ग्रामीणों का आरोप है कि एक शिक्षक के भरोसे पांच कक्षाओं का संचालन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
छात्रावास में अधीक्षिका, मूलशाला में वेतन—दावा सही है तो जांच जरूरी
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि प्रीति राऊत वर्तमान में सौसर छात्रावास में अधीक्षिका के रूप में दायित्व निभा रही हैं, जबकि उनका वेतन भुगतान मूलशाला बिसनपुर से ही किया जा रहा है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि शिक्षिका की वर्तमान पदस्थापना, कार्यस्थल, वेतन आहरण और अधीक्षक के रूप में दिए गए दायित्व से संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड में क्या स्थिति दर्ज है।
BEO ने माना—परेशानी तो हो रही है
मामले में BEO बिछुआ का कहना है कि “हम तो उच्च अधिकारियों के आदेश का पालन करते हैं। सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग के आदेश पर ही शिक्षिका को रिलीव किया जाता है। परेशानी तो हो रही है, लेकिन हम कुछ नहीं कर सकते। अधिकारियों के आदेश का पालन करना पड़ता है।”
BEO के इस बयान के बाद सवाल और गंभीर हो जाता है कि यदि स्कूल में शिक्षक की कमी से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, तो फिर विभागीय स्तर पर वैकल्पिक व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है?
एक को हटाया, दूसरा भेजना भूल गया विभाग?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विभाग को पता था कि शिक्षिका के हटने से बिसनपुर स्कूल में शिक्षक की कमी होगी, तो वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
क्या किसी अधिकारी ने यह देखने की जरूरत नहीं समझी कि एक शिक्षक पांच कक्षाओं को कैसे संभालेगा? क्या विभागीय आदेश जारी करने से पहले स्कूल की वास्तविक स्थिति का आकलन किया गया था?
यदि ग्रामीणों के आरोप सही हैं तो यह केवल पदस्थापना का मामला नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा व्यवस्था के साथ सीधे जुड़ा गंभीर प्रशासनिक प्रश्न है।
छात्रावास की व्यवस्था के लिए स्कूल क्यों हुआ कमजोर?
छात्रावास में अधीक्षिका की आवश्यकता अपनी जगह हो सकती है, लेकिन सवाल यह है कि इसके लिए एक प्राथमिक स्कूल की व्यवस्था को कमजोर क्यों किया गया?
एक तरफ छात्रावास चलाने के लिए शिक्षिका को मूलशाला से हटाया गया, दूसरी तरफ पांच कक्षाओं वाले स्कूल में एक शिक्षक छोड़ दिया गया। ग्रामीण इसी विरोधाभास को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
नियमों की दुहाई या बच्चों के अधिकार की चिंता?
ग्रामीणों का कहना है कि विभाग को केवल अपने आदेशों का पालन कराने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्रशासनिक निर्णय का सीधा असर यदि बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है तो वैकल्पिक शिक्षक उपलब्ध कराना भी विभाग की जिम्मेदारी है।
शिक्षा का अधिकार कानून के तहत प्राथमिक स्तर पर शिक्षक उपलब्धता के मानकों का पालन आवश्यक है। ऐसे में बिसनपुर की स्थिति की तत्काल विभागीय जांच और भौतिक सत्यापन जरूरी है।
सहायक आयुक्त की भूमिका पर सवाल
पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिक्षिका को मूलशाला से हटाकर छात्रावास का दायित्व देने का निर्णय आखिर किस आदेश, किस आवश्यकता और किस प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत लिया गया? यदि इस निर्णय के कारण बिसनपुर स्कूल एक शिक्षक के भरोसे रह गया, तो क्या आदेश जारी करने से पहले स्कूल में शिक्षकों की उपलब्धता का आकलन किया गया था?
ग्रामीणों की मांग है कि सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग इस मामले में सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करें कि प्रीति राऊत को बिसनपुर स्कूल से सौसर छात्रावास में दायित्व देने का आधार क्या था और उनकी जगह स्कूल में शिक्षक की वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई।
जांच हो, रिकॉर्ड सार्वजनिक हों
ग्रामीणों ने BEO बिछुआ और BRC को आवेदन देकर शिक्षिका को मूलशाला में वापस भेजने तथा स्कूल में पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था करने की मांग की है। साथ ही पूरे मामले की विभागीय जांच की मांग भी उठाई गई है।
अब सवाल केवल एक शिक्षिका की पदस्थापना का नहीं, बल्कि बिसनपुर के उन बच्चों की शिक्षा का है, जिनके लिए सरकारी स्कूल ही शिक्षा का मुख्य सहारा है। विभागीय आदेश यदि नियमसम्मत है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए और यदि आदेश के कारण स्कूल की शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित हुई है, तो जिम्मेदारी तय कर तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए।
सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग से संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।








