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रिटायरमेंट के बाद भी ‘बाबूगिरी’!पशु चिकित्सा विभाग में सेवानिवृत्त कर्मचारियों की सक्रियता पर उठे सवाल, दस्तावेज दुरुस्त करने को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म

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रिटायरमेंट के बाद भी ‘बाबूगिरी’!
पशु चिकित्सा विभाग में सेवानिवृत्त कर्मचारियों की सक्रियता पर उठे सवाल, दस्तावेज दुरुस्त करने को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म

रिपोर्ट /रामकुमार राजपूत
छिंदवाड़ा। पशु चिकित्सा विभाग एक बार फिर अपनी कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा में है। इस बार मामला विभागीय कार्यालय में पदस्थ रहे दो लिपिकीय कर्मचारियों के सेवानिवृत्ति के बाद भी कार्यालयीन कार्यों में सक्रिय नजर आने से जुड़ा है। आरोप है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी इन कर्मचारियों से विभागीय कार्य कराया जा रहा है और दस्तावेजों को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में उनकी भूमिका बनी हुई है।

सेवानिवृत्ति के बाद भी बाबू की कार्यालय में सक्रियता बनी हुई है। अच्छी वीडियो में

जानकारी के अनुसार, उप संचालक पशु चिकित्सा सेवा कार्यालय में पदस्थ एक कर्मचारी जून के अंत में तथा दूसरे कर्मचारी जुलाई के अंत में सेवानिवृत्त हुए। हालांकि, विभागीय सूत्रों का दावा है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी दोनों की कार्यालय में सक्रियता बनी हुई है। इनमें से एक कर्मचारी को लेकर बताया जा रहा है कि वे सेवानिवृत्ति के बाद भी नियमित रूप से कार्यालय पहुंच रहे हैं और लिपिकीय कार्यों में हस्तक्षेप कर रहे हैं।
अकाउंट के काम में हस्तक्षेप का भी आरोप
मामले में सबसे गंभीर सवाल लेखा शाखा के कामकाज को लेकर उठ रहे हैं। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, अकाउंट का प्रभार दूसरे कर्मचारी को सौंपे जाने के बावजूद सेवानिवृत्त कर्मचारी द्वारा लेखा संबंधी कार्यों में कथित रूप से हस्तक्षेप किया जा रहा है। यदि यह तथ्य सही है तो यह विभागीय कार्यप्रणाली और जिम्मेदारियों के निर्धारण पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
दस्तावेजों को लेकर क्यों मची है हलचल?
सूत्रों का कहना है कि कार्यालय में पुराने दस्तावेजों को व्यवस्थित और दुरुस्त करने का काम चल रहा है। इसी दौरान सेवानिवृत्त कर्मचारियों की सक्रियता को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। हालांकि, दस्तावेजों में किसी प्रकार की छेड़छाड़ या अनियमितता हुई है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
सोमवार को कुछ मीडिया कर्मियों के कार्यालय पहुंचने पर एक सेवानिवृत्त कर्मचारी को महिला कर्मचारियों को कार्यालयीन कार्य और दस्तावेजों को व्यवस्थित करने संबंधी निर्देश देते हुए देखा गया। इस दौरान कार्यालय में उनकी सक्रिय भूमिका को लेकर सवाल खड़े हुए।
नियमों की अनदेखी या विभागीय जरूरत?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सेवानिवृत्ति के बाद किसी कर्मचारी को किस आदेश या प्राधिकरण के तहत कार्यालयीन कार्य में लगाया गया है? यदि उन्हें पुनः कार्य सौंपा गया है तो क्या इसके लिए सक्षम स्तर से कोई लिखित आदेश जारी हुआ है? यदि कोई आदेश नहीं है तो सेवानिवृत्त कर्मचारी द्वारा सरकारी कार्यालय के नियमित कार्यों में हस्तक्षेप किस आधार पर किया जा रहा है?
इन सवालों का जवाब विभागीय जांच से ही स्पष्ट हो सकता है।
उच्चस्तरीय जांच की जरूरत
मामले को देखते हुए संबंधित अधिकारियों से यह स्पष्ट किए जाने की आवश्यकता है कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों को कार्यालय में कार्य करने की अनुमति किस आधार पर दी गई है। साथ ही, पिछले कुछ वर्षों के महत्वपूर्ण वित्तीय एवं प्रशासनिक दस्तावेजों की जांच, लेखा शाखा के कार्यों का सत्यापन तथा सेवानिवृत्ति के बाद कार्यालय में उनकी उपस्थिति से संबंधित रिकॉर्ड की जांच कराई जाए तो स्थिति साफ हो सकती है।
विभागीय अधिकारियों का पक्ष: मामले में पशु चिकित्सा विभाग के संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।