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एक और मासूम की मौत… फिर निलंबन! आखिर कब बदलेगा जनजाति विभाग का ‘सस्पेंड-फिर बहाली’ मॉडल?

कब रुकेगा आदिवासी बच्चों की मौत का सिलसिला? जनजाति विभाग में ‘मौत पर निलंबन, फिर बहाली’ का खेल बेनकाब!”

सिल्लेवानी आश्रम के छात्र की मौत के बाद अधीक्षक निलंबित, लेकिन चार साल में मौत, आत्महत्या, हमला, छात्राओं के गायब होने और शराब कांड तक… फिर भी नहीं बदली व्यवस्था। विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे बड़े सवाल।
छिंदवाड़ा | जनजातीय कार्य विभाग के छात्रावास और आश्रम एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। मोहखेड़ विकासखंड के सिल्लेवानी आदिवासी बालक आश्रम में कक्षा चौथी के छात्र संजय उइके की सड़क दुर्घटना के बाद मौत और घटना की सूचना 24 घंटे तक विभाग को नहीं देने के मामले में अधीक्षक को निलंबित कर दिया गया। लेकिन इस कार्रवाई ने राहत से ज्यादा एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या जनजाति विभाग में हर हादसे का इलाज सिर्फ “निलंबन” है?
पिछले चार वर्षों में छिंदवाड़ा जिले के जनजातीय छात्रावासों और आश्रमों में मौत, आत्महत्या, हमले, छात्राओं के गायब होने, शराब कांड और प्रताड़ना जैसी कई गंभीर घटनाएं सामने आईं। लगभग हर मामले में पहले निलंबन हुआ, लेकिन व्यवस्था में स्थायी सुधार के दावे धरातल पर नजर नहीं आए।
निलंबन का ‘फॉर्मूला’, लेकिन सिस्टम जस का तस
जब भी कोई बड़ा हादसा होता है, विभाग तत्काल अधीक्षक को निलंबित कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है। कुछ मामलों में बाद में अधिकारियों और कर्मचारियों की वापसी या नई पदस्थापना को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। इससे यह धारणा बन रही है कि कार्रवाई का असर व्यवस्था सुधारने के बजाय केवल तत्काल प्रतिक्रिया तक सीमित रह जाता है।
एक के बाद एक गंभीर घटनाएं…
सोनपुर छात्रावास में छात्र की मौत।
कन्या शिक्षा परिसर में छात्रा की आत्महत्या।
परतापुर आश्रम में छात्र पर जानलेवा हमला।
बटकाखापा आश्रम में उपचार में कथित लापरवाही के बाद छात्र की मौत।
उत्कृष्ट बालक छात्रावास में शराब सेवन का मामला।
छात्राओं के लापता होने की घटनाएं।
छात्राओं से निजी काम कराने और प्रताड़ना के आरोप।
शिक्षक पर छात्राओं से अशोभनीय व्यवहार के आरोप।
आश्रमों में बच्चों से सफाई करवाने के वीडियो।
और अब सिल्लेवानी आश्रम में छात्र की मौत।
इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है?

सबसे बड़ा सवाल… जवाब कौन देगा?
आखिर क्यों हर बड़ी घटना के बाद सिर्फ अधीक्षक पर कार्रवाई होती है? क्या उच्च स्तर पर जवाबदेही तय होगी? क्या पूरे जिले के छात्रावासों का स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट कराया जाएगा? क्या यह सुनिश्चित किया जाएगा कि भविष्य में किसी छात्र की जान लापरवाही की भेंट न चढ़े?