विश्व वानिकी दिवस पर प्रकृति की पाठशाला: पेड़ की छांव में गूंजा पर्यावरण बचाने का संदेश
छिंदवाड़ा (पंचायत दिशा समाचार)।
विश्व वानिकी दिवस के अवसर पर छिंदवाड़ा में एक अनूठी पहल देखने को मिली, जहां बरगद के विशाल पेड़ की छांव में “प्रकृति की पाठशाला” सजाई गई। जन अभियान परिषद द्वारा आयोजित “वन संवाद” कार्यक्रम में पर्यावरण प्रेमियों, चिंतकों और आम नागरिकों ने मिलकर विकास की दौड़ में हो रहे विनाश को रोकने पर गंभीर मंथन किया।
कार्यक्रम का संचालन मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के जिला समन्वयक अखिलेश जैन के मार्गदर्शन में हुआ, जहां वक्ताओं ने केवल पौधारोपण ही नहीं, बल्कि पौधों के संरक्षण और वृक्षों को कटने से बचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

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“वसुंधरा का श्रृंगार ही वन है” — विनोद तिवारी
पर्यावरणविद् विनोद तिवारी ने कहा कि आज का दिन सिर्फ पौधे लगाने का नहीं, बल्कि उन्हें पेड़ बनने तक सुरक्षित रखने का संकल्प लेने का है। उन्होंने भावुक शब्दों में कहा—
“वसुंधरा का श्रृंगार ही वन है, इसे कटने से रोकना हम सभी का कर्तव्य है। पेड़ मनुष्य के जीवन के हर पड़ाव में उसके साथी होते हैं, इसलिए इनके साथ मित्रता करें, न काटें और न कटने दें।”
उन्होंने जल, जंगल, जमीन और जैव विविधता के संरक्षण को जीवन का आधार बताते हुए सभी से पर्यावरण हितैषी आदतें अपनाने की अपील की।

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कार्बन उत्सर्जन पर भी हुई चिंता
परामर्शदाता डॉ. लता नागले ने आधुनिक जीवनशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि हमारी विलासितापूर्ण आदतें पर्यावरण के लिए खतरा बनती जा रही हैं।
उन्होंने कहा—
“एक ही स्थान पर जाने के लिए अलग-अलग वाहन उपयोग करना, एसी पर निर्भरता बढ़ाना—ये सब कार्बन उत्सर्जन को बढ़ाते हैं। असली अमीरी यह है कि हम पर्यावरण को कितना बचा पा रहे हैं।”
उन्होंने चेताया कि बढ़ते कार्बन उत्सर्जन से ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि, तापमान बढ़ना, ग्लेशियर पिघलना और सूखा-बाढ़ जैसी आपदाएं बढ़ रही हैं।
छोटी आदतों से बड़ा बदलाव — तृप्ति सिंह
परामर्शदाता तृप्ति सिंह ने कहा कि यदि हम दैनिक जीवन में छोटे-छोटे बदलाव करें—जैसे जल संरक्षण, ऊर्जा बचत और पौधारोपण—तो हम सच्चे अर्थों में पर्यावरण के रक्षक बन सकते हैं।
वनों की रक्षा का लिया संकल्प
कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने एक स्वर में वनों की रक्षा करने और प्रकृति को बचाने की शपथ ली।
वन्य जीवों, पेड़-पौधों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को ही मानव अस्तित्व का आधार बताते हुए यह संदेश दिया गया कि “प्रकृति बचेगी, तभी भविष्य सुरक्षित रहेगा।”







