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सतपुड़ा की वादियों में बसा सावरवानी बना आत्मनिर्भरता की मिसाल कभी रोजी-रोटी के लिए बाहर जाने वाले ग्रामीण अब गांव में ही कमा रहे सम्मानजनक आय,

सतपुड़ा की वादियों में बसा सावरवानी बना आत्मनिर्भरता की मिसाल
कभी रोजी-रोटी के लिए बाहर जाने वाले ग्रामीण अब गांव में ही कमा रहे सम्मानजनक आय, 28 दिनों में 8 लाख से अधिक का कारोबार

विशेष रिपोर्ट/रामकुमार राजपूत

छिंदवाड़ा/ मध्य प्रदेश/मोबाइल -8989115284

छिंदवाड़ा, सतपुड़ा की हसीन वादियों के बीच बसा आदिवासी ग्राम सावरवानी आज केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि अपनी मेहनत, परंपरा और ग्रामीण पर्यटन के दम पर बदलती जिंदगी की कहानी के लिए पहचाना जा रहा है। कभी रोजगार के सीमित साधनों वाला यह गांव आज ऐसा पर्यटन मॉडल बन चुका है, जहां गांव के ही लोग पर्यटकों की मेहमाननवाजी से लेकर भोजन, परिवहन, लोक संस्कृति, कृषि उत्पादों और होम स्टे तक की गतिविधियों से जुड़कर अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं।
सावरवानी की यह कहानी इस बात का उदाहरण है कि यदि गांव की प्राकृतिक संपदा, आदिवासी संस्कृति और स्थानीय हुनर को सही दिशा और बाजार मिले, तो गांव के लोगों को रोजगार के लिए दूर शहरों की ओर जाने की जरूरत नहीं पड़ती।


28 दिनों में 8 लाख से अधिक की आय ने बदली तस्वीर
तामिया विकासखंड के सुदूर अंचल में स्थित सावरवानी ने 1 से 28 अगस्त 2026 के बीच पर्यटन गतिविधियों से 8 लाख रुपये से अधिक की आय अर्जित की। यह आय किसी एक व्यक्ति या संस्था की नहीं, बल्कि गांव में संचालित विभिन्न पर्यटन गतिविधियों से जुड़े स्थानीय लोगों की मेहनत का परिणाम है।
होम स्टे, विलेज विजिट, बैलगाड़ी राइड, सैला नृत्य, ट्रैकिंग, ई-रिक्शा संचालन और स्थानीय उत्पादों की बिक्री ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति दी है। देसी घी, चावल, सब्जियां और अन्य स्थानीय उत्पाद अब पर्यटकों तक पहुंच रहे हैं।
सबसे खास बात यह है कि इस पर्यटन गतिविधि का लाभ 100 से अधिक आदिवासी परिवारों तक पहुंच रहा है। यानी पर्यटन अब केवल घूमने-फिरने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि सावरवानी के ग्रामीण परिवारों के लिए आय और रोजगार का मजबूत जरिया बन गया है।
गांव के ही लोग बने गाइड, संचालक और मेजबान
सावरवानी की सफलता की सबसे बड़ी कहानी यहां के ग्रामीणों की भागीदारी है। पर्यटक गांव में आते हैं तो उनका स्वागत स्थानीय परिवार करते हैं। कोई होम स्टे संचालित कर रहा है, कोई बैलगाड़ी राइड से जुड़ा है, कोई ई-रिक्शा चला रहा है तो कोई पर्यटकों को गांव की संस्कृति और आसपास के प्राकृतिक स्थलों से परिचित करा रहा है।
स्थानीय महिलाएं और परिवार पारंपरिक भोजन तथा स्थानीय उत्पादों के माध्यम से भी पर्यटन से जुड़ रहे हैं। वहीं गांव के युवा पर्यटन से जुड़े विभिन्न कार्यों में अपनी भूमिका निभाकर अपने ही गांव में रोजगार के अवसर तलाश रहे हैं।
इस बदलाव का सबसे बड़ा संदेश यही है कि रोजगार अब केवल शहरों में नहीं, गांव की मिट्टी में भी पैदा किया जा सकता है।


2019 से शुरू हुआ सफर आज राष्ट्रीय पहचान तक पहुंचा
सावरवानी में वर्ष 2019 से पर्यटन गतिविधियों की शुरुआत हुई थी। मध्यप्रदेश टूरिज्म बोर्ड के सहयोग से 14 जनवरी 2023 को यहां पहला होम स्टे शुरू हुआ। आज गांव में 9 होम स्टे संचालित हो रहे हैं।
गांव की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब तक 12 देशों के 300 से अधिक विदेशी पर्यटक सावरवानी पहुंच चुके हैं। देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के कारण गांव के लोगों को अपनी संस्कृति, खान-पान और स्थानीय उत्पादों को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का अवसर मिला है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों ने बढ़ाया गौरव
सावरवानी को वर्ष 2023-24 में भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय की सर्वश्रेष्ठ पर्यटन ग्राम प्रतियोगिता में गोल्डन कैटेगरी का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अलावा गांव को फाइव ग्रीन लीफ रेटिंग तथा इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिस्पॉन्सिबल टूरिज्म अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।
जिम्मेदार और सतत पर्यटन के क्षेत्र में मिली यह पहचान बताती है कि सावरवानी ने विकास के साथ अपनी प्रकृति, संस्कृति और ग्रामीण जीवनशैली को भी बचाए रखने का प्रयास किया है।


प्राकृतिक सुंदरता बनी ग्रामीणों की ताकत
सावरवानी के पास प्रकृति की ऐसी संपदा है, जो पर्यटकों को आकर्षित करती है। लेकिन इस प्राकृतिक सुंदरता को रोजगार में बदलने का काम गांव के लोगों की मेहनत और योजनाबद्ध पर्यटन विकास ने किया है।
आज यहां आने वाला पर्यटक केवल प्रकृति देखने नहीं आता, बल्कि वह गांव के लोगों के साथ समय बिताता है, स्थानीय भोजन का स्वाद लेता है, आदिवासी संस्कृति को करीब से समझता है और ग्रामीण जीवन का अनुभव लेकर लौटता है।
यही वजह है कि सावरवानी में पर्यटन का पैसा सीधे स्थानीय अर्थव्यवस्था में घूम रहा है और एक पर्यटक के आने से गांव के कई परिवारों की आय से जुड़ी कड़ी मजबूत हो रही है।
सावरवानी ने दिखाया—गांव में भी बन सकता है भविष्य
सावरवानी की कहानी केवल 8 लाख रुपये की आय की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है, जिसमें एक छोटा सा आदिवासी गांव अपनी प्राकृतिक विरासत, संस्कृति और स्थानीय हुनर को अपनी ताकत बनाकर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है।
कभी जिन परिवारों के सामने रोजगार के सीमित विकल्प थे, आज उन्हीं परिवारों के घर पर्यटकों के लिए खुल रहे हैं। गांव के युवा पर्यटन गतिविधियों से जुड़ रहे हैं, स्थानीय उत्पादों को बाजार मिल रहा है और ग्रामीणों को अपनी परंपरा पर गर्व के साथ उससे आय अर्जित करने का अवसर भी मिल रहा है।
सावरवानी की सफलता यह संदेश देती है कि विकास के लिए गांव छोड़ना जरूरी नहीं—यदि गांव की क्षमता को पहचाना जाए, तो गांव में ही रोजगार, सम्मान और समृद्धि की नई राह बनाई जा सकती है।