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अधीक्षक की पदस्थापना में नियमों की अनदेखी के आरोप, जनजातीय कार्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल..?

अधीक्षक की पदस्थापना में नियमों की अनदेखी के आरोप, जनजातीय कार्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल..!
50 छात्राओं के छात्रावास में तीन अधीक्षिकाओं की पदस्थापना का मामला चर्चा में, शिकायत के बाद दो को मूल शाला भेजा गया
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छिंदवाड़ा। जनजातीय कार्य विभाग के अधीन संचालित आश्रम शालाओं एवं छात्रावासों में अधीक्षक-अधीक्षिकाओं की पदस्थापना को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कई मामलों में शिक्षक-शिक्षिकाओं को उनकी मूल शाला से हटाकर छात्रावासों का प्रभार सौंप दिया जाता है, जबकि उनके हटने के बाद संबंधित स्कूल में शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होने की स्थिति बनती है।
इसी क्रम में बिछुआ विकासखंड के बिसनपुर स्थित प्राथमिक शाला में पदस्थ शिक्षिका प्रीति राऊत को सौसर के उत्कृष्ट कन्या छात्रावास में अधीक्षिका बनाए जाने का मामला भी चर्चा में है। शिकायत के बावजूद उन्हें मूल शाला में वापस नहीं किए जाने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस संबंध में वास्तविक स्थिति विभागीय पदस्थापना आदेश एवं रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
एक शिक्षक पर पांच कक्षाओं का बोझ?
विभाग में शिक्षक को अधीक्षक का अतिरिक्त दायित्व दिए जाने के बाद मूल विद्यालय की शिक्षण व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी सवाल है। यदि किसी प्राथमिक शाला से शिक्षक को अधीक्षक पद पर भेजा जाता है और उसके स्थान पर तत्काल वैकल्पिक शिक्षक उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो शेष शिक्षकों पर अतिरिक्त कक्षाओं का भार पड़ सकता है।
वर्तमान में चौरई विकासखंड के हरदुआमाल में भी शिक्षक को अधीक्षक बनाए जाने को लेकर इसी तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि इस मामले में पदस्थापना की प्रशासनिक आवश्यकता और स्वीकृत पदों की स्थिति विभागीय रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होगी।


50 छात्राओं के लिए तीन अधीक्षिकाएं, वर्षों तक कैसे चली व्यवस्था?
जिला मुख्यालय स्थित कन्या शिक्षा परिसर में संचालित पोस्ट मैट्रिक महाविद्यालय छात्रावास का मामला भी चर्चा में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यहां करीब 50 छात्राओं के लिए तीन अधीक्षिकाओं की पदस्थापना लंबे समय तक रही।
ऐसे में सवाल उठता है कि छात्राओं की संख्या और छात्रावास की वास्तविक आवश्यकता के अनुपात में तीन अधीक्षिकाओं की पदस्थापना किस आधार पर की गई? क्या इसके लिए सक्षम स्तर से स्वीकृति अथवा कोई स्पष्ट प्रशासनिक आदेश था? यदि तीन अधीक्षिकाएं पदस्थ थीं तो उनके बीच कार्य-विभाजन और उपस्थिति की निगरानी किस स्तर पर की गई?
शिकायत के बाद दो अधीक्षिकाएं मूल शाला वापस
मामले को लेकर शिकायत किए जाने के बाद विभागीय स्तर पर दो अधीक्षिकाओं को उनकी मूल शाला में वापस किए जाने की जानकारी सामने आई है। बताया गया है कि सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग सत्येंद्र सिंह मरकाम के स्तर से यह कार्रवाई की गई।
इस कार्रवाई के बाद ही एक अहम सवाल खड़ा हो गया है—यदि तीन अधीक्षिकाओं की पदस्थापना आवश्यक थी तो दो को वापस क्यों किया गया? और यदि आवश्यकता से अधिक पदस्थापना थी, तो यह व्यवस्था लंबे समय तक बनी कैसे रही?
इन सवालों का जवाब पदस्थापना आदेश, स्वीकृत पद, छात्र संख्या, उपस्थिति पंजी, निरीक्षण प्रतिवेदन एवं संबंधित कार्यालयीन रिकॉर्ड से स्पष्ट हो सकता है।
अधीक्षिका के पास दो आश्रम शालाओं का प्रभार भी सवालों में
कन्या शिक्षा परिसर छिंदवाड़ा में एक अधीक्षिका के पास दो आश्रम शालाओं का प्रभार होने की जानकारी भी सामने आई है। इसे लेकर भी प्रशासनिक आवश्यकता, कार्यभार तथा प्रभार दिए जाने के आधार पर सवाल उठ रहे हैं।
यदि एक ही अधिकारी/कर्मचारी को एक से अधिक संस्थानों का प्रभार दिया गया है तो यह जानना जरूरी है कि इसके लिए सक्षम अधिकारी का आदेश क्या है और दोनों संस्थानों की नियमित निगरानी किस प्रकार सुनिश्चित की जा रही है।
रात्रि विश्राम के निर्देशों की जमीनी हकीकत पर भी सवाल..!
छात्रावासों में अधीक्षक-अधीक्षिकाओं के रात्रि विश्राम को लेकर भी समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं। आरोप लगाए जाते हैं कि कुछ अधीक्षक छात्रावास में रात्रि निवास करने के बजाय अपने घर से आना-जाना करते हैं।
ऐसे मामलों में केवल भोजन व्यवस्था की फोटो अथवा ऑनलाइन उपस्थिति से वास्तविक स्थिति का आकलन मुश्किल है। यदि विभागीय निर्देशों के तहत रात्रि विश्राम अपेक्षित है, तो औचक रात्रिकालीन निरीक्षण के माध्यम से स्थिति की वास्तविक जांच की जा सकती है।
अब जांच और जवाबदेही पर निगाह
तीन अधीक्षिकाओं की पदस्थापना, कथित अनुपस्थिति, शिक्षक को मूल शाला से हटाकर अधीक्षक बनाए जाने तथा एक से अधिक संस्थानों का प्रभार दिए जाने जैसे मामलों ने विभाग की पदस्थापना एवं निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।
अब देखना होगा कि जिला प्रशासन अथवा विभागीय स्तर पर इन मामलों के रिकॉर्ड की जांच कर यह निर्धारित किया जाता है या नहीं कि पदस्थापनाएं स्वीकृत पद, छात्र संख्या, प्रशासनिक आवश्यकता और लागू नियमों के अनुरूप थीं।
यदि जांच में नियमों का उल्लंघन, अनधिकृत अनुपस्थिति अथवा प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही प्रमाणित होती है, तो जिम्मेदारी तय किए जाने की मांग भी उठ सकती है।
बड़ा सवाल
50 छात्राओं के लिए तीन अधीक्षिकाओं की पदस्थापना किस आधार पर हुई?
शिक्षक को मूल शाला से हटाने के बाद वहां की शिक्षण व्यवस्था के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था की गई?
लंबे समय तक चली पदस्थापना व्यवस्था निरीक्षण के दौरान अधिकारियों की नजर में क्यों नहीं आई?
क्या सभी अधीक्षक-अधीक्षिकाओं की पदस्थापना स्वीकृत पद और वास्तविक आवश्यकता के आधार पर हुई है?
इन सवालों का अंतिम उत्तर विभागीय रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा।
पक्ष
इस समाचार में उल्लेखित आरोपों एवं दावों की स्वतंत्र पुष्टि प्रकाशन तक नहीं हो सकी है। सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग, संबंधित अधिकारी, विद्यालय प्रबंधन एवं संबंधित अधीक्षिकाओं का पक्ष प्राप्त होने पर उसे समाचार में समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।